हे मृगनयनी , गजगामिनी, त्याग के तुम श्रृंगार
अपने रक्षण हेतु लो हाथों में तलवार
ना जाने किस वेश में दुश्मन कर दे घात
जैसे माता जानकी फसी दशानन हाथ
मत सोचो रक्षण हेतु श्री रामचंद्र जी आएंगे
अग्निपरीक्षा लेकर भी तुमको वनवास पठायेंगे
अपनी इज्जत की खातिर , धरले काली अवतार
चाहे अगणित रक्तबीज हों कर उनका संहार
जिस दिन नारी की रक्षणकर्ता नारी बन जाएगी
भरी सभा में कोई द्रौपदी दांव नही लग पायेगी
शोभा की वस्तु बनकर तू जीवन अर्थ विहीन न कर,
शक्ति स्वरूपा माँ काली बन खुद को इतना दीन न कर
यूँ त्याग तपस्या की मूरत बन कैसे आन बचाओगी
जब अपनी वधू, सुता, भगिनी बाजार में बिकती पाओगी
अपने बच्चों की खातिर ये कैसा जहाँ बसाओगी
चुडी, बिंदिया, पायल में कब तक तुम बंधती जाओगी
बंधन मुक्त करो खुद को तुम बनो स्वयम आधार
जिस दिन लड़ना सीख गई दुनिया मानेगी हार
एक दिन नारी पायेगी इस जग में अधिकार
त्रुटिओं को करना क्षमा करके ह्रदय उदार
- नीतू ठाकुर
आधुनिकता के दौर में नैतिक मूल्यों का नाश हो रहा है। मानवता को शर्मसार कर दे ऐसी घटनायें दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही हैं। नारी को उपभोग की वस्तू समझने वालों को उचित दंड मिलना अनिवार्य है। एक मनुष्य होने के नाते हमारा परम कर्तव्य है की हम अपनी आवाज बुलंद करें ताकि फिर कोई कुकर्मी ऐसा जघन्य अपराध करने से पूर्व सौ बार सोचे। अपने रक्षण हेतु नारी को खुद सशक्त होना पड़ेगा। भक्षणकर्ता से रक्षण की उम्मीद बेकार है। शक्तिशाली बनें अगर बली नही चढ़ना चाहती।
आधुनिकता के दौर में नैतिक मूल्यों का नाश हो रहा है। मानवता को शर्मसार कर दे ऐसी घटनायें दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही हैं। नारी को उपभोग की वस्तू समझने वालों को उचित दंड मिलना अनिवार्य है। एक मनुष्य होने के नाते हमारा परम कर्तव्य है की हम अपनी आवाज बुलंद करें ताकि फिर कोई कुकर्मी ऐसा जघन्य अपराध करने से पूर्व सौ बार सोचे। अपने रक्षण हेतु नारी को खुद सशक्त होना पड़ेगा। भक्षणकर्ता से रक्षण की उम्मीद बेकार है। शक्तिशाली बनें अगर बली नही चढ़ना चाहती।
