नही जानती हूँ मै उसको
जिसने ये ब्रह्माण्ड बनाया
अगणित रंग बिखेरे जिसने
सुंदरता का अर्थ बताया
दूर तलक फैले अंबर को
चंद्र ,सूर्य, तारों से सजाया
अग्नि ,जल, वायू ,पृथ्वी दे
जग को रहने योग्य बनाया
नही जानती हूँ मै उसको
जिसने सप्त सुरों को जाया
पत्थर में भी ध्वनी बसाई
सब के तन में प्राण समाया
पर जो भी है वो शक्तिमान है
जिसका गुण तो सिर्फ दान है
ढूंढ नही पाये हम उसको
कारण उसका अल्प ज्ञान है
स्वार्थ में डूबा लोभ नही जो
जबरन खुद को श्रेष्ठ बताये
छोड़ दे जग में तन्हा उसको
जो उसकी स्तुति न गाये
इतना सूक्ष्म नही हो सकता
जो धर्मों में बंटता जाये
खुद की सत्ता स्थापन हेतु
हमको अपना दास बनाये
इतना क्रूर नही हो सकता
किसी की अस्मत दांव लगाये
उल्टे -सीधे नियम बनाकर
जग में अपना भय फैलाये
भेद भाव से सदा परे है
कभी किसी का धर्म न पूछे
पशु ,पक्षी या वृक्ष, लतायें
सब को एक सरीखा सींचे
कुछ तो सोच रहा होगा वो
देख के पागल दुनिया नीचे
रक्षण हेतु सदा है तत्पर
चाहे हम उसको न पूंछे
- नीतू ठाकुर
