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बुधवार, 4 अप्रैल 2018

कितना गुरूर था मुझे अपनी उड़ान पर...नीतू ठाकुर


कितना गुरूर था मुझे अपनी उड़ान पर 
पड़ते थे ख्यालों के कदम आसमान पर 

जब होश संभाला तो कतरे हुये थे पर 
न जाने कितने पहरे थे मेरी जुबान पर 

रस्मों रिवायतों में उलझे थे  इस कदर 
कुछ वक़्त का तकाजा कुछ कौम का असर 

कुर्बान कर दी हसरतें हर इम्तिहान पर 
कालिख लगाते कैसे अपने खानदान पर 

कर ना सके यकीन किसी साहिबान पर 
खुद ही बहाये आंसू अपनी दास्तान पर 

क्या क्या न गुजरी सोचिये उस बेजुबान पर 
हर वक़्त मौत नाचती हो जिसकी जान पर 

               - नीतू ठाकुर 

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