बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

मै दर्द की एक परछाई हूँ .....नीतू ठाकुर


मै दर्द की एक परछाई हूँ 
अश्कों से निकल कर आई हूँ 
मै भी तन्हा हूँ तेरी तरह 
इस दुनिया की ठुकराई हूँ 

इस दिल में छुपी उदासी हूँ 
मै भी चाहत की प्यासी हूँ 
अनचाहा सा एहसास हूँ मै 
फिर भी हर दिल के पास हूँ मै 

हर गम की साझेदार हूँ मै 
अपने दिल से बेजार हूँ मै 
मै भी कुदरत की तराशी हूँ 
जाने क्यों आज रुआंसी हूँ 

मै तेरे दिल की दासी हूँ 
माना की जरा जुदा सी हूँ 
आती हूँ एक बुलावे पर  
पर खुद कितनी तन्हा सी हूँ 

दो तन्हा दिल मिल जाएँ तो 
शायद हालात बदल जाये 
ये आलम बड़ा उदास सा है 
दो तन्हा दिल बहल जाएँ  

कुछ गम तेरे मै बाटूंगी 
कुछ हाल हमारा सुन लेना 
हर शर्त तेरी मंजूर मुझे 
जो मर्जी हो वो चुन लेना 

         - नीतू ठाकुर 

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

मनमीत मै तेरा गीत बनूँ ....नीतू ठाकुर

मनमीत मै तेरा गीत बनूँ 
संगीत बने एहसास 
है मन में बस इतनी सी आस 
रहूँ मै हर पल तेरे पास 

दो नैनों की डोली में 
मै कितने ख्वाब सजा बैठी 
तेरे प्रीत में ऐसे रंगी 
सारे रंग भुला बैठी 
जब तक तन में साँस है बाकी 
तब तक है विश्वास 
                                                                             रहूँ मै हर पल तेरे पास  ..... 

अब न कोई राँझा है और 
ना है हीर दिवानी 
बरसों पहले ख़त्म हुई हैं 
प्रेम की अमर कहानी 
अपने अनुरागी मन का 
दुनिया न करे उपहास 
                                                                          रहूँ मै हर पल तेरे पास  ..... 

जनम जनम के बंधन में 
जब बंध बैठे दो मीत 
कभी न टूटे फिर वो नाता  
है ये जग की रीत 
किस्मत ने जोड़ा ये रिश्ता 
है हमको आभास 
                                                                            रहूँ मै हर पल तेरे पास  ...... 

विरह वेदना सह न सकेंगे 
एक पल भी खुश रह न सकेंगे 
तुम खुशियों की चाभी हो ये 
तुम से कभी हम कह न सकेंगे 
हर पल नैना तुझको ढूँढे 
तुम बिन रहें उदास 
                                                                               रहूँ मै हर पल तेरे पास  ..... 
             - नीतू ठाकुर 



बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

प्रश्न का उत्तर प्रश्न नही हो सकता है....नीतू ठाकुर


पा लेना ही प्रेम नहीं हो सकता है, 
सब कुछ खोकर भी क्या प्रेम पनपता है? 
प्रश्न किया जब जब मेरे मनमीत ने 
उत्तर देने जन्म लिया एक गीत ने 

जीवन की परिभाषा क्या है क्योँ जानें ?
सत्य असत्य के भेद को क्यों हम पहचानें? 
जीवन को ही बना दिया है प्रश्न चिन्ह 
जीवन जीने की दुनिया की रीत ने 

बनती और बिगड़ती रिश्तों की डोरी 
बंधन मुक्त हुए हैं सब छोरा-छोरी 
शिष्टाचार भुला बैठी है ये दुनिया 
बागी बना दिया तुमको इस प्रीत ने 

उसकी खातिर सदियों तक मै हारा हूँ  
वो मेरा सपना, मै उसका सहारा हूँ 
कभी धरा से कदम उखड़ने मत देना 
जुदा किया सबसे उसको उस जीत ने 

इज्जत की परवाह रही न अब जग को 
दौलत की चाहत जागी है अब सब को 
प्रश्न का उत्तर प्रश्न नही हो सकता है 
यही सिखाया कुदरत के संगीत ने  

- नीतू ठाकुर 


शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर ......नीतू ठाकुर

अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर... 
जो दिल को चीरकर लहूलुहान कर दे
धज्जियाँ उड़ा दे इज्जत की
स्वाभिमान बेजान कर दे
दफ़न होती सिसकियों का
जीना हराम कर दे
अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर.... 
जो वजूद मिटाते थे
मुझे मुझसे ही छीनकर
मेरी नजरों में गिराते थे
घूरते थे मुझको
मेरी औकात दिखाते थे
मेरी लाचारी मेरी बेबसी का
तमाशा बनाते थे
अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर... 
जो गिनते थे मेरी रोटी के टुकड़े
मेरे कपड़ों के एहसान और
खिदमत में गुजारी ज़िंदगी के बदले में
दिया तुम्हारा नाम
अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर.... 
जो मेरे प्यार और समर्पण को झूठा बनाते थे
खड़ा करते थे मुझे कटघरे में
मुकदमा चलाते थे
रुलाते थे मेरी आत्मा को
गद्दार,बेकार ,गैरजिम्मेदार कहकर
अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर.... 
जो ज़िंदगी में खलल मचाते थे
मुझसे मेरा सब कुछ छीन कर
मुझे ही मुजरिम बनाते थे
अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर.... 
क्यों की मर चुकी है वो आत्मा
जो तुझ पर अपनी जान कुरबान कर दे
तेरे पैरों की धुल बनकर
ज़िंदगी तेरे नाम कर दे
        - नीतू ठाकुर  

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

कैसे समझाएँ.....नीतू ठाकुर


चीरकर पर्बतों को आज चली है मिलने 
बहती नदिया की रवानी को कैसे समझाएँ 

खारे सागर से मिलकर खुद को मिटा लेगी वो 
ऐसी बेखौफ दिवानी को कैसे समझाएँ 

जनता है वो मगर फिर भी है खामोश अभी 
आज सागर का जले दिल तो कैसे समझाएँ 

देखकर आज छलक आई हैं नभ की आँखें 
रो के तूफ़ान मचाये तो कैसे समझाएँ 

हर  तरफ़ प्यार की लहरों का फैलना देखो 
प्यार दुनिया को मिटाये तो कैसे समझाएँ 

इतनी संगदिल तो नहीं थी हमारी कुदरत पर 
आज फ़रियाद न सुने तो कैसे समझाएँ 
                    - नीतू ठाकुर 





शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

इन्द्रधनुष- मधुर मिलन की परछाई..... नीतू ठाकुर


सूरज की प्यासी किरणें जब 
बारिश से मिलने जाती है 
और नन्ही नन्ही बूँदों से 
वो अपनी प्यास बुझाती हैं 
उस मधुर मिलन की परछाई 
कुछ ऐसे रंग सजाती है 
बटती है  सात रंग में वो 
और इन्द्रधनुष बन जाती है 
फिर मेघ नाद गूँजे नभ में 
बिजली भी चमक दिखती है 
पर प्यासे तड़प रहे मन को 
वो कहाँ जुदा कर पाती है 
फिर झूम उठे सारी सृष्टी 
उन रंगों में खो जाती है 
ये पल दो पल की परछाई 
सब के मन को हर्षाती है 
वो चित्रकार हो या शायर 
एक नई उम्मीद जगाती है 
कितने ही सूने जीवन के 
सपनों में रंग सजाती है 

       - नीतू ठाकुर 




चित्र बनते काव्य जो...विपदा @ नीतू ठाकुर 'विदुषी'

गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी के मार्गदर्शन में कलम की सुगंध कुटुंब द्वारा आयोजित चित्राधारित काव्य प्रतियोगिता हेतु.... चित्र बनत...