विधिना का लेख लिखित ना हो
मृत्यू का क्षण अंकित ना हो
पर शाश्वत पल हो जीवन का
जब जीवन सूर्य उदित ना हो
जब त्याग के इस नश्वर तन को
मै इस जग से प्रस्थान करूँ
तब अंतिम क्षण हे शिव शंकर
मै बस तेरा ही ध्यान करूँ
गंगा की गोदी में बैठूँ
अंतिम बारी स्नान करूँ
जिस पथ पर अंतिम बार चलूँ
उस पथ का निश्चित स्थान करूँ
उस पथ से ले जाना मुझको
जिस पथ पर कोई पतित न हो
जहाँ सुख समृद्धि वास करे
जिस पथ पर कोई व्यथित न हो
ऐसा एक पल हो जीवन में
जहाँ धर्मांधों का राज न हो
भूखे तन का आक्रोश न हो
मन क्रंदन की आवाज न हो
जहाँ ज्ञान सुधा की वृष्टि हो
और सप्त सुरों का साज बजे
अज्ञान धरा में मिल जाये
साहित्य का सुंदर नाद सजे
उस पथ से ले जाना मुझको
जहाँ श्वेत वस्त्र में सजे हों तन
सज्जनता का उपहास करे
ना दिखे कोई भी कलुषित मन
तब संध्या की चुनरी ओढ़े
जीवित तन का एहसास करूँ
अंतिम बारी नतमस्तक हो
मै इस जग का परित्याग करूँ
- नीतू ठाकुर
