गुरुवार, 18 मार्च 2021

स्वप्न की पगडंडियों पर...नीतू ठाकुर 'विदुषी'


 शुष्क से कुछ पुष्प व्याकुल

पुस्तिका से झाँक रोये

स्वप्न की पगडंडियों पर

अनकहे हर भाव खोये


बीहड़ों से इस हॄदय में

हर्ष कब करता बसेरा

स्वप्न की नगरी अनोखी

जी रही जो बिन सवेरा

कंटकों के बाग निष्ठुर

नेह के कब बीज बोये


शब्द लिख लिख कर मिटाती

लिख न पाए एक पाती

लेखनी की धार टूटी

व्यंजना के गीत गाती

देहरी करती करती प्रतीक्षा

जीर्ण तन का भार ढोये


मृत्यु सा दुख यूँ मनाती

आँसुओं की शाल झीनी

कष्ट की परछाइयों में

राख की खुशबू है भीनी

शोक की शैया सजाकर

बाँसुरी के राग सोये


@नीतू ठाकुर 'विदुषी'

बुधवार, 17 मार्च 2021

नेह का गणित...नीतू ठाकुर


 नेह का गणित

(मुक्तक)

मिले जो नेह की गिनती, दहाई पर अटक जाए।
जमा करलो घटा बेशक मगर उत्तर खटक जाए।
गणित के जाल में उलझे पहाड़ा प्रेम का झूठा।
चले दिन रात मन सीधा परीक्षा में भटक जाए।

नवगीत

*नेह का गणित*

भाग करता वेदना का
कष्ट फिर हर्षित हुआ है
ये जमा झंझट पटकता
फोड़ सिर चर्चित हुआ है।।

शून्य से करती गुणा है
हर खुशी को भाग्य रेखा
व्याधियों में स्थित दशमलव
हर घड़ी बढ़ते ही देखा
शून्य सा संसार मेरा
मौन पर गर्वित हुआ है

मूलधन पूरा बचा है
ब्याज में साँसे मिटी हैं
जिंदगी के इस गणित में
सिर्फ खुशियाँ ही घटी हैं
प्रश्न अनसुलझे खड़े हैं
सार ये गर्भित हुआ है

भूमिती सिद्धांत पाकर
ये गणित भी नित्य फलता
वर्ग जब देखे त्रिभुज को
वृत्त को ले साथ चलता
दे विफलता सूत्र भूले
नेह आकर्षित हुआ है।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

पातियाँ संदूक से ...नवगीत


 


पातियाँ संदूक से
मापनी ~ 14/12

यूँ विरह का गान करती
पातियाँ संदूक से
तिलमिलाई है घटा भी 
कोकिला की हूक से।।

कंकड़ों के चीखने से
कब हॄदय पथ का जला
लाँघती है पीर सीमा
घाव अंतस में पला
भाग्य पल में है बदलता
कंडियों में चूक से।।

रेत तपती जा रही है
बूँद बिन ज्यों भूख से
माँगते है प्राण आश्रय
सब झुके हैं रूख से
घास के तृण पीर सहते
सुन रहे हैं मूक से।।

रो रही हैं सब शिलाएँ
जो समाधी पर सजी
फूल भी मुरझा गए सब
जब चटक चूड़ी बजी
दे रही उत्तर व्यथा के
आज फिर दो टूक से।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

सौगंध पुरानी ...नीतू ठाकुर 'विदुषी'

 नवगीत सौगंध पुरानी मापनी 12/12 इक नौका इतराती झूमी दीवानी सी हर रेत हुई खारी अर्णव के पानी सी तट मौन खड़े दर्शक वृक्षों की संगत में केसरिया ...