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बुधवार, 12 सितंबर 2018

बेखौफ लहरें .....नीतू ठाकुर


जरा तहज़ीब सिखलाये , कोई बेखौफ लहरों को 
जो अक्सर तोड आती हैं , कड़े सागर के पहरों को 

सुनाती हो भला क्यों यूँ , प्रलय का गीत बहरों को 
तुम्हारे खेल में मिटते हुए , देखा है शहरों को

मिटाकर क्या मिला तुमको , नही कुछ साथ ले जाती 
भयानक याद बनती हो ,जो बिछड़ों को नही भाती 

तेरी नादानियों से सूर्य  भी , बेनूर लगता है 
अंधेरी रात में चंदा , शर्म से चूर लगता है 

क्षितिज के पार देखो , चांदनी आंसू बहाती है 
तेरा साया जहाँ पड़ता , सिसकती भोर आती है 

ये टूटे आशियाँ आँखों में , बिखरे ख्वाब बाकी हैं 
दिए सौगात में आंसू , बता तू कैसा साकी है 

 - नीतू ठाकुर 

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