जरा तहज़ीब सिखलाये , कोई बेखौफ लहरों को
जो अक्सर तोड आती हैं , कड़े सागर के पहरों को
सुनाती हो भला क्यों यूँ , प्रलय का गीत बहरों को
तुम्हारे खेल में मिटते हुए , देखा है शहरों को
मिटाकर क्या मिला तुमको , नही कुछ साथ ले जाती
भयानक याद बनती हो ,जो बिछड़ों को नही भाती
तेरी नादानियों से सूर्य भी , बेनूर लगता है
अंधेरी रात में चंदा , शर्म से चूर लगता है
क्षितिज के पार देखो , चांदनी आंसू बहाती है
तेरा साया जहाँ पड़ता , सिसकती भोर आती है
ये टूटे आशियाँ आँखों में , बिखरे ख्वाब बाकी हैं
दिए सौगात में आंसू , बता तू कैसा साकी है
- नीतू ठाकुर
