मंगलवार, 16 जून 2020

आलिंगन.... नीतू ठाकुर 'विदुषी'


नवगीत
आलिंगन
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी~ 16/14

कुंचित काली अलकें महकी
मधुर पर्शमय अभिनंदन
चंद्र प्रभा सी तरुणाई पर
महका तन जैसे चंदन।।

कजरारी अँखियों के सपने
निद्रा से जैसे जागे
दर्पण में श्रृंगार निहारे
चित्त पिया पर ही लागे
पिया मिलन की आस हँसी जब
सोच आगमन आलिंगन।।


दो तन एक प्राण बन बैठे
तीव्र बजे श्वासों की धुन
मौन अधर पर कंपन थिरके
कहे पलक से सपने बुन
राग छेड़ती वीणा तारें
दौड़ रहा नख तक स्पंदन

तप्त धरा पर बूँद टपकती
धरणी देख रही नभ को
सागर से मिलने को व्याकुल
भूल गई सरिता सबको
गीत गा रही आहें मिलकर
अमर प्रेम का ये बंधन

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

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