सोमवार, 27 जनवरी 2020

विरह वेदना....नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नवगीत : नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मुखड़ा पूरक पंक्ति 16/14 
अंतरा 16/14 

विरह वेदना की लहरों में 
जीवन की नदियां बहती
सावन की वह मंद फुहारें 
तन-मन स्वाहा कर दहती

सूनी हैं सपनों की गलियाँ
अपनों का आभास नही
इतनी वीरानी है छाई
मन भी मन के पास नही 

फिर भी आशाएं जीवित है
दर पर ये आँखे रहती
विरह वेदना की लहरों में 
जीवन की नदियां बहती

कितनी बार जलाएं दीपक
इन अँधियारी गलियों में
पतझड़ का मौसम छाया है
भ्रमर नही है कलियों में

मेरे साथ धरा ये रोती
सुख दुख अपने है कहती 
विरह वेदना की लहरों में 
जीवन की नदियां बहती

हार चुका तन साँसे लेकर
अब विश्राम जरूरी है
प्राण पखेरू उड़ना चाहें
कैद बनी मजबूरी है

तन है घायल मन आहत है
बड़ी यातना है सहती 
विरह वेदना की लहरों में 
जीवन की नदियां बहती

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

रविवार, 26 जनवरी 2020

कह मुकरी ... नीतू ठाकुर 'विदुषी'

कह मुकरी
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

चिकना तन और पतली काया
सारे जग का मन भरमाया
नूतन रोज दिखाता स्टाइल
हे सखि साजन? ना मोबाइल

सबके मन में खौफ बनाता
अच्छे खासों को जो समझाता
पीट पीट कर करता ठंडा
हे सखि साजन? ना सखि डंडा

जो भूकंपी दाड़ बजाता
गुस्सा जिसको ऐसा आता
कितनो को तो मार पछाड़ा
हे सखि दानव? ना सखि जाड़ा

नही किसी से जो है डरता
हर कोई उससे है मरता
जिसका रूप करे बेहाल
हे सखी सर्प ? ना सखी काल

रातों का जो साथी रहता
साथ रहूंगा जो यूँ कहता
दुःख में जो देता है संबल
हे सखि साजन? ना सखि कम्बल

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

माहिया टप्पे... नीतू ठाकुर 'विदुषी'


माहिया टप्पे 
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

तू छत पे कल आना
गन्ना चूसेंगे 
बेशक जल्दी जाना

गन्ने जब टूटेंगे
तूने बहकाया
घरवाले कूटेंगे 

सावन में गायेगी
कोयल काली तो
मेढ़क को पाएगी 

काली कोयल गाए
डाली पर बैठी
जो तेरे मन भाये 

महकेगी बगिया जब
रजनीगंधा सी
आऊंगी मिलने तब 

देखें नैना दिन भर
सपने रातों में
आजा गोरी तू घर

झर झर नैना बरसे
बिछड़े हम तुमसे
मिलने को मन तरसे

बरखा में भीगेगी 
चल हट अब गौरी
जाकर घर छींकेंगी

तू बर्गर खा लेना
मैं लूंगी पिज्जा
तू पैसे दे देना 

रातों में जागेंगे
झिंगुर जैसे हम
घर से क्यों भागेंगे

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

श्वास है अवरुद्ध मन से (नवगीत)...नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नवगीत नीतू ठाकुर 'विदुषी'
मुखड़ा/पूरक पंक्ति~14/14
अंतरा~14/14

श्वास है अवरुद्ध मन से
बह रही है अश्रु धारा
मिट रहा आँखों का काजल
छोड़ पलकों का किनारा

प्रीत की यह रीत कैसी
जो ह्रदय को पीर देती
चैन छीने जो नयन के 
स्वप्न भी सब छीन लेती

कुछ व्यथित जब सिंधु देखा 
फिर नदी देती सहारा 
श्वास है अवरुद्ध मन से
बह रही है अश्रु धारा

यूँ सुगंधित तन धरा का
देख अंबर झूमता है 
ओस की बूंदे टपकती 
भृंग कलियाँ चूमता है 

देख एकाकी कलानिधि
हँस रहा है शुक्र तारा
श्वास है अवरुद्ध मन से
बह रही है अश्रु धारा

जल रहे हैं दीप बाती
घोर छाया तम घनेरा
सिसकियों में ढूंढता है
गीत कोई आज मेरा

जीत कर है खिन्न ये मन
हार से भी आज हारा
श्वास है अवरुद्ध मन से
बह रही है अश्रु धारा

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

अधर को मौन रहने दो....नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नव गीत 
14/14

अधर को मौन रहने दो
नयन हर भेद खोलेंगे
हृदय भी मौन ही समझे 
समझ के भाव बोलेंगे 

धरा का मौन बादल ही
समझता जानता है सब
चकोरी चाँद की बातें 
सुनाई दे रही हैं अब 
मयूरा मेघ से कहता 
बता हिय बात ही वो कब

मगर कुछ देख बेचैनी 
बरस के प्रीत घोलेंगे 
अधर को मौन रहने दो
नयन हर भेद खोलेंगे

कहे कुछ ज्वार भाटा भी 
मिले सागर कहाँ चंदा
पलक ही बोल देती हैं 
हिले जब भाव में मंदा
बचे रति बाण से कैसे 
पड़े जब नेह का फंदा    

सभी यूँ मूक दिखते हैं 
नहीं ये मौन डोलेंगे
अधर को मौन रहने दो
नयन हर भेद खोलेंगे

भ्रमर से बोलती है कब 
गुलाबी सी कली महकी 
भले ही दौड़ती देखी 
कभी तितली कहीं बहकी 
जले सब आग में बेशक 
कहेंगी ये नहीं दहकी 

मगर ये उस समर्पण में 
कहाँ कब मौन तोलेंगे
अधर को मौन रहने दो
नयन हर भेद खोलेंगे

नयन में रंग बासन्ती
बहारें देख फागुन की 
भरे मन झूल अम्बर सी 
पड़ी जब डाल जामुन की 
हिलोरें उठ रही ऐसे 
बने ज्यूँ झाग साबुन की 

अगर दृग में फँसे आकर
समझ ले खूब रोलेंगे
अधर को मौन रहने दो
नयन हर भेद खोलेंगे

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

रविवार, 19 जनवरी 2020

किस्मत चौसर (नवगीत)....नीतू ठाकुर 'विदुषी'



नवगीत 

खेल रही है किस्मत चौसर 
फेक रही है कैसे पासे
भ्रमित हो रहा मानव ऐसे
मानवता मिट रही धरा से
1
जीवन का उद्देश्य भुलाकर
दास बने धन को अपनाकर
तिमिर व्याप्त है सारे जग में
अंतर्मन की चीख मिटाकर

कठपुतली बन जीवन जीते, 
कौन ज्ञान के दीपक चासे
भ्रमित हो रहा मानव ऐसे
मानवता मिट रही धरा से
2
चाह सुखों की जीवन हरती
पाप पुण्य की गठरी भरती
चाह जगी अंबर छूने की
पर आशाएं हर पल मरती 

घुट घुट कर जीता है मानव
सूखे बीत रहे चौमासे
भ्रमित हो रहा मानव ऐसे
मानवता मिट रही धरा से 
3
जीवन का आभास नही है
कुछ पाने की आस नही है
हिय कुंठित व्याकुल है कितना
खुद पर भी विश्वास नही है

स्वर्थ ढूंढते रिश्ते नाते
छलते खुद को अच्छे खासे
भ्रमित हो रहा मानव ऐसे
मानवता मिट रही धरा से

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

सौगंध पुरानी ...नीतू ठाकुर 'विदुषी'

 नवगीत सौगंध पुरानी मापनी 12/12 इक नौका इतराती झूमी दीवानी सी हर रेत हुई खारी अर्णव के पानी सी तट मौन खड़े दर्शक वृक्षों की संगत में केसरिया ...