शनिवार, 25 अप्रैल 2020

आँसू : नीतू ठाकुर 'विदुषी'



नवगीत
आँसू
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी 16/16

घाव हँसे खुशियों के आँसूं 
एक और की चाहत कहकर।।
प्रीत हृदय में मौन खड़ी थी
भाव पड़े अंतस के ढह कर

1
विरह गीत लिख रही लेखनी
आज डूब कर स्याही में
छोड़ सिसकता भूल गया जो
नेह खोजती राही में
बंद द्वार पाषाणी हिय में
मुक्त हुए कुछ दिन ही रहकर

2
बिखरे रिश्तों  की तुरपन कर
शूल बनी चुभती हर याद
किसे छलोगे प्रेम जाल रच
बचा शेष क्या मेरे बाद
मनमंथन में विष प्राशन कर
साँस हँसी पीड़ा को सहकर

3
सपने आँखों से ओझल हो
पोछ रहे नैनों का कजरा
खनक भूलकर टूटी चूड़ी
पायल रूठी बिखरा गजरा 
बिन श्रृंगार बनी जब जोगन
क्या करती पीड़ा में दहकर

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

रेल जैसी जिंदगी : नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नवगीत
रेल जैसी जिंदगी
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी 14/14

और अन्तस् मौन चीखे
धड़धड़ाहट शोर आगे
रेल जैसी ज़िंदगी ये
पटरियों के संग भागे

1
कल्पनाओं से भरा है
मिथ्य यह संसार देखा
बंधनों में बांधती है
जीवितों को भाग्य रेखा
व्याधियाँ हँसने लगी हैं
सो रहे दिन रात जागे।

उलझनें सुलझा रहा मन
साँस का है खेल सारा
कर्म की तलवार लेकर
प्रज्ञ बदले काल धारा
मोह में लिपटे हुए है
नेह के नाजुक ये धागे

3
ज़िंदगी के रूप का जब
भाव हैं श्रृंगार करते
सुख दुखों के मोतियों को
एक दोना देख भरते
बोलती सी बाँसुरी से
लेखनी स्वर आज त्यागे

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

श्वासों की वीणा : नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नवगीत
श्वासों की वीणा
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी~ 16/14

टूटी श्वासों की वीणा ने
सरगम को ऐसे गाया।
झंकृत हिय स्पंदन सा करती
हिरदे गहरा तम छाया।।

1
शरद पूर्णिमा जैसी रातें
देखी अमृत बरसाते
अमर हो गया प्रेम पुष्प पर
देखा जीवित हिय खाते
देकर पाषाणों सी ठोकर
प्रेम कहाँ पर ले आया।।

2
मिश्री सी बातें विष बन कर
अंतस में घुलती जाए
मृग तृष्णा से जाल बिछाकर
जीवन को छलती जाए
वही हॄदय को छोल रहा है
कभी जो मेरे मन भाया।।

3
संग रहा परछाई बन जो
आज वही मुख मोड़ रहा
सूख गई सुख की जलधारा
दुख के बादल ओढ़ रहा
प्रीत रीत को बिसरा कर के
स्तूप विचारों का ढाया।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

मधुमास : नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नवगीत
मधुमास
नीतू ठाकुर 'विदुषी' 

मापनी 13/11

विरह अग्नि दहके बदन
भटक रही थी श्वास
आज प्राण अटके हुये 
ढूंढे एक उजास

1
कलियों का गुंजन सुना
भ्रमर महकते खूब 
शुष्क नहीं तृण एक फिर
चमक उठी हर दूब
लदी खड़ी वह मंजरी 
दृश्य मनोरम पास

2
नृत्य मोर का देखता
हरा भरा उद्यान
पैर देख आहत हुए
गूँगा कोकिल गान
तितली पंख पसारती
पाकर प्रिय आभास 

3
पुलकित हर्षित है नलिन
करता कीच विलाप
विरह बाण की चोट से
मन करता संताप
*उमड़ घुमड़ छाता रहा*
*हृदय प्रीत मधुमास*

4
मधुमासी बहती हवा
छेड़ रही है राग
चंदन से लिपटे हुये 
पूछ रहे कुछ नाग
शान्त चित्त होता तभी
मिले अगर विश्वास ।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

चित्र बनते काव्य जो...विपदा @ नीतू ठाकुर 'विदुषी'

गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी के मार्गदर्शन में कलम की सुगंध कुटुंब द्वारा आयोजित चित्राधारित काव्य प्रतियोगिता हेतु.... चित्र बनत...