मंगलवार, 25 मई 2021

वीरता के उपासक श्रीनेत राजपूत



राजपूतों की वंशावली :

“दस रवि से दस चन्द्र से, बारह ऋषिज प्रमाण,

चार हुतासन सों भये  , कुल छत्तिस वंश प्रमाण

भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान

चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण.”

अर्थ:-दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय,   दस चन्द्र वंशीय, बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है, बाद में भौमवंश. , नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग- अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का पमाण मिलता है।

 

*वीरता के उपासक श्रीनेत राजपूत*


वंश निकुम्भ जहाँ तक देखा,

रघुकुल का है दिव्य प्रकाश।

जिनकी गौरव गाथाओं को,

गाते हैं धरती आकाश।।


भारद्वाज प्रवर उत्तमता,

कहते ये मित्रों के मित्र।

श्री नगर सा धाम बसा कर,

धरणी पर गढ़ते जो चित्र।।


अंगिरसी है श्रेष्ठ प्रवर जो,

उसकी महिमा देख महान।

कहलाये जो वीर उपासक।

रक्तिम रवि जिनकी पहचान।।


वार्हस्पत्य प्रवर दूजा है

करते इसका श्रेष्ठ बखान।

जिनके श्रम से थे लहराए,

पर्वत नदिया वन खलिहान


चण्डी कुल की देवी को मैं 

आज झुकाती अपना भाल।

अपने भक्तों की खतिर जो,

प्रतिपल रहती बनके ढाल।।


साम सुना है वेद हमारा 

उत्तम वाणी की पहचान।

रघुकुल से उपजी यह शाखा,

उत्तम कुल का है अभिमान।।


सूत्र सुना गोभिल है हमने

जिसको कहते हैं गृहसूत्र।

मुगलों को पावन करते थे,

छिड़क छिड़क के जो गोमूत्र।।


शाक्त सशक्त कहा है वैष्णव 

धर्म इसी का गौरव गान।

सत्यपरायण शासक थे जो,

मर्यादा का रखते भान।।


और प्रमुखगद्दी टिहरी में,

कहते हैं जिसको गढ़वाल।

शौर्य समाया था रग रग में,

बनते थे दुर्बल की ढाल।।


राजा नल से धैर्य मिला था,

दमयंती से पाया रूप।

रघुकुल के वंशज कहलाये,

जन्म समय से श्रेष्ठ अनूप।।


कुण्ड हवन में दहके ज्वाला,

क्षत्रिय कुल का यूँ विस्तार।

बर्फीली चट्टानों में अरि

हिमखण्डों सा ले आकर।।


मुगलों का आतंक मचा था,

धर्मों पर थी तेज कटार।

राजपुताना की तलवारें,

कैसे सहती अत्याचार।।


बैरी बनकर नित आ जाता,

राजाओं का अपना स्वार्थ।

रिपु बनकर षड्यंत्र रचाता,

करना चाहे स्वप्न कृतार्थ।।


दृश्य मनोरम उस घाटी के,

बन बैठे जी का जंजाल।

हर कोई हथियाना चाहे,

शीश मुकुट भारत का भाल।।


आँधी जैसे घुसते जाते,

श्री नगरी पर ले हथियार।

फिर भी धीरज थामे देखा

दीपक की लौ को हरबार।।


लाशों के अम्बार लगाते,

दुश्मन गरजा सीना तान।

वीर उपासक कब सह पाते,

अपनी धरणी का अपमान।।


हार विजय की बात नही थी,

बस खटकी थी वो ललकार।

दुश्मन को अब राख बनाने,

राजपुताना थी तैयार।।


तोपों के सन्मुख होकर भी,

कब घबराए योद्धा वीर।

मातृ धरा की रक्षा के हित,

रिपुदल के दें मस्तक चीर।।


शंख बजाकर नाद करें जब,

कम्पित होते थर-थर प्राण।

माता चण्डी प्रकटी दिखती,

करने को पुत्रों का त्राण।।


तलवारों की गर्जन सुनकर,

रिपु दल की रुक जाती श्वास।

राजपुताना रक्त उबलता,

नस नस में बढ़ता विश्वास।।


दानव जैसे हँसते अरि का,

तोड़ा जबड़ा उखड़े दाँत।

हिमशिखरों की शितलता में,

सून उदर से बाहर आँत।।


विपदा का ताण्डव था छाया,

आँख लिलोरे देखे काल।

मृत्यु दिखी जब रिपुदल भागे,

साहस ऐसा था विक्राल।।


भाल अनंत भुजा बिखरी थी,

घाटी ताण्डव का आधार।

रक्त प्रवाहित नदिया बहती,

क्रंदन गूँजे हाहाकार।।


सैनिक दस्ते और मंगाए,

दुगनी गति से करते वार।

भूकंपी सी आहट होती,

भर तलवारें युद्ध हुँकार।।


रिपु कहता शरणागत आओ,

बच जाएंगे सबके प्राण।

वीरों ने हँसकर ललकारा,

कर बैठेगा तू ही द्राण।।


शीश कटाने को आतुर है,

इस धरती का हर सरदार।

किंतु समर्पण कायरता है,

मर जागेंगे या दें मार।।


रक्त नदी बहती है रण में,

हार विजय की बहती नाव।

चीलों से भरता है अम्बर,

शौर्य बढ़ाते ऐसे भाव।।


चीख रही थी घाटी पूरी,

खोकर अपने प्यारे लाल।

विधवा जैसी दिखती नगरी,

रिक्त हुआ था आँचल भाल।।


जीवन को संघर्ष बनाया,

और नहीं मानें जो हार।

तानाशाही अंग्रेजों पर,

राजपुताना तेज प्रहार।।


गोरिल्ला भी अवसरवादी,

करते रहते थे नित घात।

इनको भी तो धूल चटाई,

दिव्य रही कुल की सौगात।।


दुश्मन देखे छाती पीटे,

जैसे आया सन्मुख काल।

अपनी साँस बचाये मूरख,

या थामे फिर अपनी ढाल।।


कालों के ये काल कहाये,

दुश्मन का करके संहार।

अंग्रेजों की नींद उड़ा दी,

ऐसी देते उनको मार।।


अंग्रेजों के शीश चढ़ा कर,

कुलदेवी को देते मान।

धरती माता के चरणों में,

पूजित है ऐसा बलिदान।।


जिनके भय से छुप जाते थे,

दुष्ट कुकर्मी लेकर प्राण।

मुगलों की नव मील सुरंगे,

देती उसका पुष्ट प्रमाण।।


जीवन को संघर्ष बनाया,

और नहीं मानें जो हार।

तानाशाही अंग्रेजों पर,

राजपुताना तेज प्रहार।।


गोरिल्ला भी अवसरवादी,

करते रहते थे नित घात।

इनको भी तो धूल चटाई,

दिव्य रही कुल की सौगात।।


क्षत्रिय कुल का गौरव ऊँचा,

जिनका रहता ऊँचा शीश।

मात पिता गुरु धरणी पूजें,

रक्षक बनते जिनके ईश।।


गोरखपुर की मिट्टी गाती,

इतिहासों का गौरव गान।

श्रीनेतों की कर्म स्थली है,

जिसका उनको है अभिमान।।


घूँघट काढ़ चलें सब दुश्मन,

भूलें पौरुष बनते नार।

ऐसे वीर लड़ाकू योद्धा,

श्रीनेत बने उनके भरतार।।


झुकना जिनका काम नही है,

लिखते हैं वो ही इतिहास।

राजपुताना गौरव चमके,

जैसे करता सूर्य उजास।।


शत शत वंदन करते उनको,

जिनका है पूजित बलिदान।

भारत वासी होना ही था,

जिनके अन्तस् का अभिमान।।


अपना सबकुछ अर्पण करते,

बनते शासक श्रेष्ठ महान।

शीश झुकाया जिसने अरि से,

वो क्या जाने ये बलिदान।।


उच्च महल खो उच्च हवेली,

जीवित है जिनका अभिमान।

क्षत्रिय कुल नत मस्तक होकर,

देता उन वीरों को मान।।


रिपु के पग की रजकण चाटें,

रजवाडें समझें अपमान।

तोड़ घमण्ड वहाँ दें धन का,

लोग करें जब धन सम्मान।।


जब तक धरती अम्बर जीवित,

तब तक गाएंगे यह गान।

क्षत्रिय कुल के बलिदानों पर,

जीवित है भारत की शान।।


नीतू ठाकुर 'विदुषी'

सोमवार, 24 मई 2021

राजपुताना चालीसा (इजरायल ने राजपूतों की शौर्यगाथा)



राजपुताना चालीसा
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

*हमारे राजपूत पूर्वज जिन्होंने इजरायल की स्वतंत्रता के लिए युद्ध कौशल दिखा कर अपने प्राणों का बलिदान देकर भी इजरायल को स्वतंत्र करा कर दम लिया मुझे गर्व होता है अपने पूर्वजों पर जिनके यश का डंका भारत ही नहीं भारत के बाहर भी बजता है शहीद हुए राजपूत सैनिकों को हृदय से श्रद्धांजलि ....*

*राजपुताना चालीसा* 

चीख रहा है मृत पृष्ठों से,
वीरों का पावन इतिहास।
राजपुताना के साहस बिन,
इजराइल बन जाता दास।।

नाम नही है गाथाओं में
कैसा निर्मम अत्याचार।
अपने वीरों की गिनती में
देश हुआ कैसे लाचार।।

लोरी गाकर आज सुलाती,
धरती माता अपने वीर।
हँसते हँसते झेल गए जो,
उसपर उठते सारे तीर।।

इजरायल के मृत प्राणों में,
जिसने फूँके अपने श्वास।
याद करो आओ सब मिलके,
अपने वीरों का इतिहास।।

इजरायल को मुक्त कराये,
राजपुताना के सरदार।
धक-धक रिपु की छाती धड़के,
निर्मम इनके तेज प्रहार।।

अनजानी गलियों में कैसे,
भटके होंगे इतने वीर।
चहुँ दिश से जब घेर रहे थे,
मारक बनते घातक तीर।।

धरती अम्बर एक हुए से,
पीस रहे थे बन के पाट।
भारत माँ के वीर सिपाही,
उतरे जब इजराइल घाट।।

आग उगलते अम्बर देखा,
बंजर सी धरती लाचार।
कौन सजता इन वीरों की,
गर्दन में फूलों का हार।।

सूख रहे थे तृण के जैसे,
जल बिन उखड़ी जाती श्वास।
पर अंतस में भरा हुआ था,
वीरों का खुद पर विश्वास।।

शत्रु खड़े थे जाल बिछाये,
उन्हें नहीं था इसका माप।
जिनको आज फँसाने निकले,
वो निकलेंगे इनके बाप।।

भान उन्हें था कर्तव्यों का,
हिय में धरती का अभिमान।
अपने साथ बचा सकते हैं,
इस धरती का भी सम्मान।।

दिखता सारा देश अपरचित,
जैसे दूजे ग्रह के जीव।
जल जीवन सारा परिवर्तित
तोड़ें कैसे अरि की नीव।।

दोनों हाथ पसरे ताके
वृद्ध सरीखा वो रणक्षेत्र।
चिंगारी सी दहक रही थी,
रक्तिम से थे सारे नेत्र।।

काँप रही थी मारुत भय से,
मरुथल जैसा लगता भाग।
सन्नाटा पसरा था जैसे,
धड़ पर नाचें अगणित नाग।।

बाज बने टूटे सेना पर,
नोची आतें तोड़े हाड़।
बौछारें होती रक़्तों की,
डरके छुपते लंबे ताड़।।

तोपें निकली दुल्हन बन के,
पीछे उनके सैन्य कतार।
टप टप भय से देख बरसती,
रिपु के तन स्वेदों की धार।।

रावण की लंका के जैसे,
बावन गज के सारे वीर।
कितने तो निज तोपें देखे,
गिनते बाकी अपने तीर।।

जलती हर अंतस में ज्वाला,
कितना लेता रक्त उबाल।
जान चुके थे राजपुताना,
अपने दुश्मन की हर चाल।।

नाप रही थी तोला-तोला,
सेना इन सब की औकात।
क्षण भर में मिट जाएंगे या,
युद्ध चलेगा पूरी रात।।

आरी से काटें दुश्मन को,
या फिर ढूँढे केवल शूल।
शक्ति का आभास कराती,
रणभूमी में उड़ती धूल।।

एक सिपाही सौ को मारे,
या फिर काटे शीश हजार।
कितने सैनिक की टुकड़ी हो,
मारो गिनके लाख हजार।।

नाच रही जो रणभूमी में,
कौन बने उसका भरतार।
विपदा सलहज सी मुस्काई,
आतुर थी करने को वार।।

मूंछे ताने सैनिक सारे,
करते देखे शेर हुँकार।
सोच रहे थे डर जाएगी
राजपुताना की तलवार।।

मच्छर जैसे भिन-भिन करते,
गाते-जाते अपना राग।
बीन बजाओ तो कुछ समझें,
राजपुताना के ये नाग।।

सोच रही थी बकरी लेगी,
शेरों से अपना प्रतिशोध।
एक वार से डर जाएगी,
भागेगी जब देखे क्रोध।।

चींटी सपना देख रही थी,
देगी हाथी पैर उखाड़।
कछुये जैसे अब चीते को,
देंगे मीलों आज पछाड़।।

अंगद के पग जैसे जमते,
राजपुताना के सब वीर।
इजरायल में तोप चली जब,
इनके चलते केवल तीर।।

जितनी भी क्षमता है तुझ में,
आज लगाओ अपना जोर।
एक बार तलवार उठी तो,
देख न पाओगे फिर भोर।।

भूखी तोप कई को खाती,
उतनी बढ़ती जाती भूख।
दावानल सी दहक रही भू ,
भय से काँपे सारे रूख।।

राजपुताना के वीरों ने 
क्षण में बदली अपनी चाल।
मधुमक्खी के जैसे टूटे
करते दुश्मन को बेहाल।।

काट उपज खलिहान बना सा,
रण का क्षेत्र दिखे इस हाल।
एक तरफ तलवार चली तो,
दूजी ओर बचाती ढाल।।

राजपुताना देख चमकता,
इजरायल में बनके दीप।
अगणित सूरज नतमस्तक थे,
यूँ दुश्मन को देता लीप।।

निश्चित कर लो लक्ष्य अभी भी,
अपनी क्षमता को पहचान।
अंत समय तक शव होंगे या,
प्राणों को मिलता वरदान।।

बोटी-बोटी कर डालेंगे,
बेचेंगे जाकर बाजार।
इतना कौशल लेकर घूमें,
अपने हाथों में हथियार।।

तीव्र सुनामी जैसी गति ले
दौड़ी वीरों की तलवार।
स्पर्श हुए बिन गिरते कट के,
जाने कितने लाख हजार।।

पीस रहे चटनी के जैसे,
सैनिक तोप सभी हथियार।
दानव भी थर्राये पल भर,
ऐसा था भीषण संहार।।

नौ सौ ने थे प्राण गँवाये,
तेरा सौ को कर के कैद।
कितने प्राण पखेरू उड़ते,
देख अचंभित सारे बैद।।

वीरों ने इतिहास रचा पर,
भूल गए उनको सब लोग।
ऐसे ही पापों को धोने,
आता है कोरोना रोग।।

इजरायल नतमस्तक होकर,
लेता है भारत का नाम।
अपने हिय में रखते जीवित,
राजपुताना का वो धाम।।

शत शत वंदन करलो उनका,
जिनके दम पर है अभिमान।
बच्चों का है फर्ज बचाना,
अपने पुरखों का सम्मान।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

रविवार, 23 मई 2021

मन की बात / ओछी सरकार


 *मन की बात*


धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार

किसी छिछोरै प्रेमी जैसी

स्वप्न दिखा ठगती हर बार


बुलट ट्रेन की आस दिलाकर

हँसते देखो सायकल छीन

नाचे नग्न नर्तकी जैसे

माइकल खुद को समझे दीन

अपनी बीवी विधवा कर के

बनते दुनिया के भरतार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


बाँट चवन्नी कहते रुपया

हरिश्चंद्र की ये औलाद

टकरा कर हर आँसू रोया

ऐसा है सीना फौलाद

महँगाई का खीँचे फंदा

बोले गाओ राग मल्हार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


अच्छे दिन का शौक मिट गया

दिनभर ढूँढें रोटी नून

पहले तीन बार खाते थे

अब पाते हैं बस दो जून

घूँघट काढ़े मर्द घूमते

बन्द हुए सारे व्यापार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


अंध भक्त को करते वंदन

मुख से झरते जिनके फूल

कैसे पिघला लेते हैं ये

अंतस में चुभता हर शूल

बस जुमले की टॉफी बाँटे

मिथ आश्वासन की भरमार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


भय लगता है कुछ कहने से

कुत्तों की सुनकर हुंकार

बिना सत्य जाने करते हैं

इनके चेले नरसंहार

देवों ने नत मस्तक होकर

बंद किये अपने दरबार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


कितना नेह लगाया तुमसे

पूज रहा था ये संसार

गिरगिट जैसे रंग बदलते

दैत्य बना है तारणहार

भूल हुई विश्वास किया जो

अब गर्दन पर है तलवार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


नीतू ठाकुर 'विदुषी'

चित्र बनते काव्य जो...विपदा @ नीतू ठाकुर 'विदुषी'

गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी के मार्गदर्शन में कलम की सुगंध कुटुंब द्वारा आयोजित चित्राधारित काव्य प्रतियोगिता हेतु.... चित्र बनत...