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गुरुवार, 9 अगस्त 2018

शहीद की माँ... नीतू ठाकुर


सरहद पे चली जब गोली
तब माँ धरती से बोली
मेरा लाल है तेरे हवाले
कहीं लग ना जाये गोली

रस्ता देख रहें हैं उसका
व्याकुल से दो नैना
पिछले बरस ही लाई थी
मै नई दुल्हन का गौना
सूनी ना होने देना
दुल्हन की मेरे कलाई
जीते जी मर जाऊँगी
अगर बेवा नजर वो आई

सरहद पे चली जब गोली  .....

नन्ही बिटिया खो ना दे
कहीं बाबुल का आधार
एक बार भी कर ना पाया
बेटा उसको प्यार
बिन बाबुल के पा न सकेगी
चाहत और दुलार
नन्ही सी उस जान पे
कर देना  इतना उपकार

सरहद पे चली जब गोली  .....

खून से लथपथ लाल मेरा 
जब सपनों में है आता 
सीना छलनी हो जाता है 
जब वो मुझे बुलाता 
होती रहती है अब घर में 
अश्कों की बरसात 
नींद नही आती अब हमको 
सारी सारी रात 

सरहद पे चली जब गोली  .... 

धरती का जवाब :-

वीर शहीदों की लाशों पर 
कितने नीर बहाऊँ 
कहाँ छुपाऊँ लालों को 
मै खुद ही समझ ना पाऊँ 
मेरी खातिर लड़ते है 
मुझपर ही चला कर गोली 
तुम सब मेरे लाल हो 
यूँ  ना खेलो खून की होली 
मिलजुलकर सब साथ रहो 
चाहे भले अलग हो बोली 
कोई हरा न पायेगा 
अगर बन जाओ एक टोली 

- नीतू ठाकुर 


गुरुवार, 26 जुलाई 2018

किस्मत के फैसले.... नीतू ठाकुर


न जाने किसके हाथ हैं किस्मत के फैसले 
बढ़ती ही जा रहीं हैं राहों की मुश्किलें 
सजदा करें तो किसके दर पर करें बता ?
कब तक रहेंगे कायम इस दिल के हौसले ?

नेकी और शराफत भी बेकार हो गए 
मेहनत के पसीने भी बेजार हो गए 
काटों भरी हैं राहें मंजिल भी लापता 
तकदीर लिखनेवाले अपना पता बता ?

किस जुर्म की सजाएँ सहते रहें हैं हम 
जो हमसफ़र बनें हैं इस जिंदगी के गम 
कोई तो रास्ता हो कोई तो हो दयार 
कब तक करेगी जिंदगी खुशियों का इंतजार ?

दिखते नही क्या जुल्म ? सुनता नही क्या आहें ?
किससे करें फरियाद गम में किसे बुलाएँ ?
इतनी भी देर ना कर की उम्र गुजर जाये 
जब सामने हों खुशियाँ तब हम न नजर आएं 

                 - नीतू ठाकुर 

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

मनवा डोले जैसे हिंडोला ....नीतू ठाकुर


एक तरफ बाबुल की गलियाँ 
एक तरफ संसार पिया का 
किसको थामूं किसको छोडूं 
दोनों हैं आधार जिया का 

आगे कुँवा तो पीछे खाई 
जगने कैसी रीत बनाई 
किस्मत ने क्या खेल है खेला 
मनवा डोले जैसे हिंडोला 

अपनों को क्यों गैर बनालूं 
गैरों को कैसे अपनालूं 
चीर के अपनी माँ का आँचल 
कैसे अपनी शाल बनालूं 

क्यों अरमान मिटा लूँ अपने 
क्यों सपनों को आग लगालूं 
इन पैरों में बांध के बेड़ी 
मन में झूठे स्वप्न सजालूं 

एक तरफ है बचपन सारा 
दूजी  ओर किस्मत का तारा 
भूत ,भविष्य खड़े हैं दोनों 
क्या होगा अंजाम हमारा 

       - नीतू ठाकुर  

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

पंख कटे पैरों में बेड़ी..... - नीतू ठाकुर


पंख कटे पैरों में बेड़ी
गुजरी उम्र बची बस थोड़ी
मिट्टी से जन्में पुतलों को
मिट्टी में मिल जाना है

एक बार बस एक बार
उस अंबर को छू आना है 

रीत, रिवाज, समाज के डर से 
खुद को मुक्त कराना है 
लाचारी की छोड़ दुशाला 
दुनिया से टकराना है 

एक बार बस एक बार 
उस अम्बर को छू आना है 

तुच्छ ,हीन ,अज्ञानी बनकर 
शून्य नही रह जाना है 
अर्थहीन जीवन को अपने 
अर्थवान कर जाना है 

एक बार बस एक बार 
उस अंबर छू आना है 

इस दुनिया के नक़्शे पर 
अपनी पहचान बनाना है 
जीवन एक संकल्प बनाकर 
जन्म सफल कर जाना है 

एक बार बस एक बार 
उस अंबर को छू आना है 

          - नीतू ठाकुर 

चित्र साभार - गूगल 

गुरुवार, 10 मई 2018

इल्म की सौगातें.... नीतू ठाकुर


इंतजार, इजहार, गुलाब, ख्वाब, वफ़ा, नशा
उसे पाने की कोशिशें तमाम हुई, आजमाइशें सरेआम हुई

अदब, कायदा, रस्में, रवायतें, शराफत, नेकी 
हर घडी बेजान हुई, रिश्तों की गहराइयां चुटकियों में तमाम हुई 

इज्जत, ईमान, हया, नजाकत, मासूमियत, पाकीजगी 
वक़्त के साथ कुर्बान हुई, खानदान की अस्मत बेपर्दा खुलेआम हुई  

सवाल, सलाह, मशवरा, हिदायतें, नसीहतें, फिक्र,  
जब से चुभने का सामान हुई, इल्म की सौगातें भी जैसे हराम हुई       

बदजुबानी, बदतमीजी, बदमिजाजी,बेखयाली, बेअदबी, बेशर्मी 
जब से अंदाज-ए-गुफ्तगू बदनाम हुई, बुजुर्गों की जुबान बेजुबान हुई

हवस, हैवानियत, दरिंदगी, वहशीपन, आतंक, खौफ,
जब से ये बातें आम हुई, इंसानों की इंसानियत गुमनाम हुई     

                                 - नीतू ठाकुर 


   

सोमवार, 7 मई 2018

नही जानती हूँ मै उसको....नीतू ठाकुर


नही जानती हूँ मै  उसको 
जिसने ये ब्रह्माण्ड  बनाया 
अगणित रंग बिखेरे जिसने 
सुंदरता का अर्थ बताया 

दूर तलक फैले अंबर को 
चंद्र ,सूर्य, तारों से सजाया 
अग्नि ,जल, वायू ,पृथ्वी दे 
जग को रहने योग्य बनाया 

नही जानती हूँ मै उसको 
जिसने सप्त सुरों को जाया 
पत्थर में भी ध्वनी बसाई 
सब के तन में प्राण समाया 

पर जो भी है वो शक्तिमान है 
जिसका गुण तो सिर्फ दान है 
ढूंढ नही पाये हम उसको  
कारण उसका अल्प ज्ञान है 

स्वार्थ में डूबा लोभ नही जो 
जबरन खुद को श्रेष्ठ बताये 
छोड़ दे जग में तन्हा उसको 
जो उसकी स्तुति न गाये  

इतना सूक्ष्म नही हो सकता 
जो धर्मों में बंटता जाये 
खुद की सत्ता स्थापन हेतु 
हमको अपना दास बनाये 

इतना क्रूर नही हो सकता 
किसी की अस्मत दांव लगाये  
उल्टे -सीधे नियम बनाकर 
जग में अपना भय फैलाये 

भेद भाव से सदा परे है 
कभी किसी का धर्म न पूछे 
पशु ,पक्षी या वृक्ष, लतायें 
सब को एक सरीखा सींचे 

कुछ तो सोच रहा होगा वो 
देख के पागल दुनिया नीचे 
रक्षण हेतु सदा है तत्पर 
चाहे हम उसको न पूंछे 

    - नीतू ठाकुर 


शुक्रवार, 4 मई 2018

एक तुम्ही तो हो.....नीतू ठाकुर

रोज मै तुम्हें कितना 
इंतजार करवाता हूँ 
थक हारकर जब 
लौटकर आता हूँ 
ज़िंदगी की उलझनों में 
खोया खोया सा मै 
तुम्हारी प्यारी सी मुस्कान को 
नजरअंदाज कर जाता हूँ 
कभी कभी गुस्से में 
बहुत कुछ कह जाता हूँ 
और तुम्हारे जाने के बाद 
अधूरा सा रह जाता हूँ 
धधकती मन की ज्वाला से 
तुमको जलाता हूँ 
निर्दोष होते हुए भी 
कितना कुछ सुनाता हूँ 
क्यों की तुम ही तो हो जो 
समझ सकती हो मेरे जज्बात और 
हर पल कोसते परेशान करते मेरे ख़यालात 
एक तुम्ही तो हो 
जिसे अपना समझ कर 
सता सकता हूँ ,रुला सकता हूँ और 
प्यार के दो मीठे शब्दों से 
मना भी सकता हूँ 
जब पड़ जाती है रिश्ते में खटास 
तब भी दिल के किसी कोने में 
बच जाती है यादों की मिठास 
तुमसे मिलने के लिए 
दिल बेकरार रहता है 
इन आँखों को पल पल 
तुम्हारा इंतजार रहता है 
मै कुछ भी क्यो न करलूं पर 
तुम लौटकर आओगी 
ये ऐतबार रहता है 
तुम्हारे और मेरे दरमियाँ 
कायम हमेशा प्यार रहता है 
एक तुम ही तो हो जो 
इस पागल को अपना सकती हो 
मेरी हर खता भुलाकर 
मेरी खुशियों के लिए मुस्कुरा सकती हो 
तुम और सिर्फ तुम  ... 

             - नीतू ठाकुर 


शहीद की माँ... नीतू ठाकुर

सरहद पे चली जब गोली तब माँ धरती से बोली मेरा लाल है तेरे हवाले कहीं लग ना जाये गोली रस्ता देख रहें हैं उसका व्याकुल से दो न...