मंगलवार, 13 जुलाई 2021

आँखे भर-भर आती है....नीतू ठाकुर 'विदुषी'

 गीत 

आँखे भर-भर आती है

नीतू ठाकुर 'विदुषी'


कितने किस्से रक्त सने से, आँखे भर-भर आती है।

अश्रु धार फिर कण्टक पथ का, जल अभिषेक कराती है।।


व्यंग्य कसावट लेकर निकले, माता सी धुकती दिखती।

भोर काल में पूर्व दिशा से, रात सदा छिपती दिखती।

और हरण कर बल तारों को, अहम दिखे शशि का लज्जित।

चिड़ियों की चहकों पर आते, होते जब सूर्य सुसज्जित।

दिवस मिले इस दिनकर से जब, खुशियां गीत सुनाती है।

अश्रु धार फिर कण्टक पथ का, जल अभिषेक कराती है।।


तिमिर संकुचित ज्यूँ दिनकर से, हर्ष कष्ट को खो देता।

मत गिनना पुरुषार्थ यही है, मानव के दुख हर लेता।।

कृष्ण पार्थ की उस जोड़ी ने, इतना ज्ञान दिया सबको।

कर्म मार्ग पर बढ़ते जाओ, पय का दान दिया सबको।।

शिथिल इंद्रियाँ बोध दिलाकर, अपना कार्य बनाती है।

अश्रु धार फिर कण्टक पथ का, जल अभिषेक कराती है।।


चाक चले निर्मित घट होता, काल चलाये जन निर्मित।

गीले तन पर लगें थपेड़े, आकृति सुंदर हो चर्चित।।

और बने जन गुल्लक जैसे, जो जीवन भर लेते हैं।

कुछ लटकें पीपल घट जैसे, बनकर भूत चहेते हैं।।

स्वर्णिम युग निर्माण करे नित, ये मानव की थाती है।

अश्रु धार फिर कण्टक पथ का, जल अभिषेक कराती है।।


नीतू ठाकुर 'विदुषी'



सोमवार, 7 जून 2021

चित्र बनते काव्य जो...विपदा @ नीतू ठाकुर 'विदुषी'


गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी के मार्गदर्शन में कलम की सुगंध कुटुंब द्वारा आयोजित चित्राधारित काव्य प्रतियोगिता हेतु.... चित्र बनते काव्य जो...

विपदा


क्षण भर ठहर सके जो विपदा, मैं अंतस की बातें कर लूँ।

पिघला दूँ हर टीस हृदय की, अपनों की हर पीड़ा हर लूँ।


जीवन हवन कुंड सा तपता, राख बनाता जो सपनों को

बरसों बीत गए हैं देखे, अपनी आँखों से अपनों को

कर्म गणित उलझा सा खुद में, जोड़ घटा से कुछ तो माने

पुनः भेंट कब संभव होगी, ये तो बस विधिना ही जाने


झीनी स्मृतियों की झोली में, कुछ खुशियों के पल तो भर लूँ

क्षण भर ठहर सके जो विपदा, मैं अंतस की बातें कर लूँ।


घोर तिमिर में ढूंढ रही है, बूढ़ी माँ की अंधी ममता

उसका भार उठा कब पाई, मेरे तरुणाई की क्षमता

बचपन की गलियाँ हैं भूली, उनका कोई चित्र बनालूँ

कर्तव्यों की बंजर भू पर, बोध भरा एक पुष्प उगा लूँ


क्षमा याचना कर लूँ उनसे, शीश चरण कमलों में धर लूँ

क्षण भर ठहर सके जो विपदा, मैं अंतस की बातें कर लूँ।


क्षुब्ध हृदय की नीरवता में, गीत अधूरे बिलख रहे हैं।

मेरी उम्मीदों के सूरज, आतुरता से निरख रहे हैं

पाषाणों सी मौन प्रीत को, भाव पुष्प से कुछ महका दूँ

रूठी रूठी सी हर पीड़ा, झूठी आस बँधा चहका दूँ


वंशहीन होने से पहले, कुलदेवी से अंतिम वर लूँ

क्षण भर ठहर सके जो विपदा, मैं अंतस की बातें कर लूँ।


©नीतू ठाकुर 'विदुषी'



मंगलवार, 25 मई 2021

वीरता के उपासक श्रीनेत राजपूत



राजपूतों की वंशावली :

“दस रवि से दस चन्द्र से, बारह ऋषिज प्रमाण,

चार हुतासन सों भये  , कुल छत्तिस वंश प्रमाण

भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान

चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण.”

अर्थ:-दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय,   दस चन्द्र वंशीय, बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है, बाद में भौमवंश. , नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग- अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का पमाण मिलता है।

 

*वीरता के उपासक श्रीनेत राजपूत*


वंश निकुम्भ जहाँ तक देखा,

रघुकुल का है दिव्य प्रकाश।

जिनकी गौरव गाथाओं को,

गाते हैं धरती आकाश।।


भारद्वाज प्रवर उत्तमता,

कहते ये मित्रों के मित्र।

श्री नगर सा धाम बसा कर,

धरणी पर गढ़ते जो चित्र।।


अंगिरसी है श्रेष्ठ प्रवर जो,

उसकी महिमा देख महान।

कहलाये जो वीर उपासक।

रक्तिम रवि जिनकी पहचान।।


वार्हस्पत्य प्रवर दूजा है

करते इसका श्रेष्ठ बखान।

जिनके श्रम से थे लहराए,

पर्वत नदिया वन खलिहान


चण्डी कुल की देवी को मैं 

आज झुकाती अपना भाल।

अपने भक्तों की खतिर जो,

प्रतिपल रहती बनके ढाल।।


साम सुना है वेद हमारा 

उत्तम वाणी की पहचान।

रघुकुल से उपजी यह शाखा,

उत्तम कुल का है अभिमान।।


सूत्र सुना गोभिल है हमने

जिसको कहते हैं गृहसूत्र।

मुगलों को पावन करते थे,

छिड़क छिड़क के जो गोमूत्र।।


शाक्त सशक्त कहा है वैष्णव 

धर्म इसी का गौरव गान।

सत्यपरायण शासक थे जो,

मर्यादा का रखते भान।।


और प्रमुखगद्दी टिहरी में,

कहते हैं जिसको गढ़वाल।

शौर्य समाया था रग रग में,

बनते थे दुर्बल की ढाल।।


राजा नल से धैर्य मिला था,

दमयंती से पाया रूप।

रघुकुल के वंशज कहलाये,

जन्म समय से श्रेष्ठ अनूप।।


कुण्ड हवन में दहके ज्वाला,

क्षत्रिय कुल का यूँ विस्तार।

बर्फीली चट्टानों में अरि

हिमखण्डों सा ले आकर।।


मुगलों का आतंक मचा था,

धर्मों पर थी तेज कटार।

राजपुताना की तलवारें,

कैसे सहती अत्याचार।।


बैरी बनकर नित आ जाता,

राजाओं का अपना स्वार्थ।

रिपु बनकर षड्यंत्र रचाता,

करना चाहे स्वप्न कृतार्थ।।


दृश्य मनोरम उस घाटी के,

बन बैठे जी का जंजाल।

हर कोई हथियाना चाहे,

शीश मुकुट भारत का भाल।।


आँधी जैसे घुसते जाते,

श्री नगरी पर ले हथियार।

फिर भी धीरज थामे देखा

दीपक की लौ को हरबार।।


लाशों के अम्बार लगाते,

दुश्मन गरजा सीना तान।

वीर उपासक कब सह पाते,

अपनी धरणी का अपमान।।


हार विजय की बात नही थी,

बस खटकी थी वो ललकार।

दुश्मन को अब राख बनाने,

राजपुताना थी तैयार।।


तोपों के सन्मुख होकर भी,

कब घबराए योद्धा वीर।

मातृ धरा की रक्षा के हित,

रिपुदल के दें मस्तक चीर।।


शंख बजाकर नाद करें जब,

कम्पित होते थर-थर प्राण।

माता चण्डी प्रकटी दिखती,

करने को पुत्रों का त्राण।।


तलवारों की गर्जन सुनकर,

रिपु दल की रुक जाती श्वास।

राजपुताना रक्त उबलता,

नस नस में बढ़ता विश्वास।।


दानव जैसे हँसते अरि का,

तोड़ा जबड़ा उखड़े दाँत।

हिमशिखरों की शितलता में,

सून उदर से बाहर आँत।।


विपदा का ताण्डव था छाया,

आँख लिलोरे देखे काल।

मृत्यु दिखी जब रिपुदल भागे,

साहस ऐसा था विक्राल।।


भाल अनंत भुजा बिखरी थी,

घाटी ताण्डव का आधार।

रक्त प्रवाहित नदिया बहती,

क्रंदन गूँजे हाहाकार।।


सैनिक दस्ते और मंगाए,

दुगनी गति से करते वार।

भूकंपी सी आहट होती,

भर तलवारें युद्ध हुँकार।।


रिपु कहता शरणागत आओ,

बच जाएंगे सबके प्राण।

वीरों ने हँसकर ललकारा,

कर बैठेगा तू ही द्राण।।


शीश कटाने को आतुर है,

इस धरती का हर सरदार।

किंतु समर्पण कायरता है,

मर जागेंगे या दें मार।।


रक्त नदी बहती है रण में,

हार विजय की बहती नाव।

चीलों से भरता है अम्बर,

शौर्य बढ़ाते ऐसे भाव।।


चीख रही थी घाटी पूरी,

खोकर अपने प्यारे लाल।

विधवा जैसी दिखती नगरी,

रिक्त हुआ था आँचल भाल।।


जीवन को संघर्ष बनाया,

और नहीं मानें जो हार।

तानाशाही अंग्रेजों पर,

राजपुताना तेज प्रहार।।


गोरिल्ला भी अवसरवादी,

करते रहते थे नित घात।

इनको भी तो धूल चटाई,

दिव्य रही कुल की सौगात।।


दुश्मन देखे छाती पीटे,

जैसे आया सन्मुख काल।

अपनी साँस बचाये मूरख,

या थामे फिर अपनी ढाल।।


कालों के ये काल कहाये,

दुश्मन का करके संहार।

अंग्रेजों की नींद उड़ा दी,

ऐसी देते उनको मार।।


अंग्रेजों के शीश चढ़ा कर,

कुलदेवी को देते मान।

धरती माता के चरणों में,

पूजित है ऐसा बलिदान।।


जिनके भय से छुप जाते थे,

दुष्ट कुकर्मी लेकर प्राण।

मुगलों की नव मील सुरंगे,

देती उसका पुष्ट प्रमाण।।


जीवन को संघर्ष बनाया,

और नहीं मानें जो हार।

तानाशाही अंग्रेजों पर,

राजपुताना तेज प्रहार।।


गोरिल्ला भी अवसरवादी,

करते रहते थे नित घात।

इनको भी तो धूल चटाई,

दिव्य रही कुल की सौगात।।


क्षत्रिय कुल का गौरव ऊँचा,

जिनका रहता ऊँचा शीश।

मात पिता गुरु धरणी पूजें,

रक्षक बनते जिनके ईश।।


गोरखपुर की मिट्टी गाती,

इतिहासों का गौरव गान।

श्रीनेतों की कर्म स्थली है,

जिसका उनको है अभिमान।।


घूँघट काढ़ चलें सब दुश्मन,

भूलें पौरुष बनते नार।

ऐसे वीर लड़ाकू योद्धा,

श्रीनेत बने उनके भरतार।।


झुकना जिनका काम नही है,

लिखते हैं वो ही इतिहास।

राजपुताना गौरव चमके,

जैसे करता सूर्य उजास।।


शत शत वंदन करते उनको,

जिनका है पूजित बलिदान।

भारत वासी होना ही था,

जिनके अन्तस् का अभिमान।।


अपना सबकुछ अर्पण करते,

बनते शासक श्रेष्ठ महान।

शीश झुकाया जिसने अरि से,

वो क्या जाने ये बलिदान।।


उच्च महल खो उच्च हवेली,

जीवित है जिनका अभिमान।

क्षत्रिय कुल नत मस्तक होकर,

देता उन वीरों को मान।।


रिपु के पग की रजकण चाटें,

रजवाडें समझें अपमान।

तोड़ घमण्ड वहाँ दें धन का,

लोग करें जब धन सम्मान।।


जब तक धरती अम्बर जीवित,

तब तक गाएंगे यह गान।

क्षत्रिय कुल के बलिदानों पर,

जीवित है भारत की शान।।


नीतू ठाकुर 'विदुषी'

सोमवार, 24 मई 2021

राजपुताना चालीसा (इजरायल ने राजपूतों की शौर्यगाथा)



राजपुताना चालीसा
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

*हमारे राजपूत पूर्वज जिन्होंने इजरायल की स्वतंत्रता के लिए युद्ध कौशल दिखा कर अपने प्राणों का बलिदान देकर भी इजरायल को स्वतंत्र करा कर दम लिया मुझे गर्व होता है अपने पूर्वजों पर जिनके यश का डंका भारत ही नहीं भारत के बाहर भी बजता है शहीद हुए राजपूत सैनिकों को हृदय से श्रद्धांजलि ....*

*राजपुताना चालीसा* 

चीख रहा है मृत पृष्ठों से,
वीरों का पावन इतिहास।
राजपुताना के साहस बिन,
इजराइल बन जाता दास।।

नाम नही है गाथाओं में
कैसा निर्मम अत्याचार।
अपने वीरों की गिनती में
देश हुआ कैसे लाचार।।

लोरी गाकर आज सुलाती,
धरती माता अपने वीर।
हँसते हँसते झेल गए जो,
उसपर उठते सारे तीर।।

इजरायल के मृत प्राणों में,
जिसने फूँके अपने श्वास।
याद करो आओ सब मिलके,
अपने वीरों का इतिहास।।

इजरायल को मुक्त कराये,
राजपुताना के सरदार।
धक-धक रिपु की छाती धड़के,
निर्मम इनके तेज प्रहार।।

अनजानी गलियों में कैसे,
भटके होंगे इतने वीर।
चहुँ दिश से जब घेर रहे थे,
मारक बनते घातक तीर।।

धरती अम्बर एक हुए से,
पीस रहे थे बन के पाट।
भारत माँ के वीर सिपाही,
उतरे जब इजराइल घाट।।

आग उगलते अम्बर देखा,
बंजर सी धरती लाचार।
कौन सजता इन वीरों की,
गर्दन में फूलों का हार।।

सूख रहे थे तृण के जैसे,
जल बिन उखड़ी जाती श्वास।
पर अंतस में भरा हुआ था,
वीरों का खुद पर विश्वास।।

शत्रु खड़े थे जाल बिछाये,
उन्हें नहीं था इसका माप।
जिनको आज फँसाने निकले,
वो निकलेंगे इनके बाप।।

भान उन्हें था कर्तव्यों का,
हिय में धरती का अभिमान।
अपने साथ बचा सकते हैं,
इस धरती का भी सम्मान।।

दिखता सारा देश अपरचित,
जैसे दूजे ग्रह के जीव।
जल जीवन सारा परिवर्तित
तोड़ें कैसे अरि की नीव।।

दोनों हाथ पसरे ताके
वृद्ध सरीखा वो रणक्षेत्र।
चिंगारी सी दहक रही थी,
रक्तिम से थे सारे नेत्र।।

काँप रही थी मारुत भय से,
मरुथल जैसा लगता भाग।
सन्नाटा पसरा था जैसे,
धड़ पर नाचें अगणित नाग।।

बाज बने टूटे सेना पर,
नोची आतें तोड़े हाड़।
बौछारें होती रक़्तों की,
डरके छुपते लंबे ताड़।।

तोपें निकली दुल्हन बन के,
पीछे उनके सैन्य कतार।
टप टप भय से देख बरसती,
रिपु के तन स्वेदों की धार।।

रावण की लंका के जैसे,
बावन गज के सारे वीर।
कितने तो निज तोपें देखे,
गिनते बाकी अपने तीर।।

जलती हर अंतस में ज्वाला,
कितना लेता रक्त उबाल।
जान चुके थे राजपुताना,
अपने दुश्मन की हर चाल।।

नाप रही थी तोला-तोला,
सेना इन सब की औकात।
क्षण भर में मिट जाएंगे या,
युद्ध चलेगा पूरी रात।।

आरी से काटें दुश्मन को,
या फिर ढूँढे केवल शूल।
शक्ति का आभास कराती,
रणभूमी में उड़ती धूल।।

एक सिपाही सौ को मारे,
या फिर काटे शीश हजार।
कितने सैनिक की टुकड़ी हो,
मारो गिनके लाख हजार।।

नाच रही जो रणभूमी में,
कौन बने उसका भरतार।
विपदा सलहज सी मुस्काई,
आतुर थी करने को वार।।

मूंछे ताने सैनिक सारे,
करते देखे शेर हुँकार।
सोच रहे थे डर जाएगी
राजपुताना की तलवार।।

मच्छर जैसे भिन-भिन करते,
गाते-जाते अपना राग।
बीन बजाओ तो कुछ समझें,
राजपुताना के ये नाग।।

सोच रही थी बकरी लेगी,
शेरों से अपना प्रतिशोध।
एक वार से डर जाएगी,
भागेगी जब देखे क्रोध।।

चींटी सपना देख रही थी,
देगी हाथी पैर उखाड़।
कछुये जैसे अब चीते को,
देंगे मीलों आज पछाड़।।

अंगद के पग जैसे जमते,
राजपुताना के सब वीर।
इजरायल में तोप चली जब,
इनके चलते केवल तीर।।

जितनी भी क्षमता है तुझ में,
आज लगाओ अपना जोर।
एक बार तलवार उठी तो,
देख न पाओगे फिर भोर।।

भूखी तोप कई को खाती,
उतनी बढ़ती जाती भूख।
दावानल सी दहक रही भू ,
भय से काँपे सारे रूख।।

राजपुताना के वीरों ने 
क्षण में बदली अपनी चाल।
मधुमक्खी के जैसे टूटे
करते दुश्मन को बेहाल।।

काट उपज खलिहान बना सा,
रण का क्षेत्र दिखे इस हाल।
एक तरफ तलवार चली तो,
दूजी ओर बचाती ढाल।।

राजपुताना देख चमकता,
इजरायल में बनके दीप।
अगणित सूरज नतमस्तक थे,
यूँ दुश्मन को देता लीप।।

निश्चित कर लो लक्ष्य अभी भी,
अपनी क्षमता को पहचान।
अंत समय तक शव होंगे या,
प्राणों को मिलता वरदान।।

बोटी-बोटी कर डालेंगे,
बेचेंगे जाकर बाजार।
इतना कौशल लेकर घूमें,
अपने हाथों में हथियार।।

तीव्र सुनामी जैसी गति ले
दौड़ी वीरों की तलवार।
स्पर्श हुए बिन गिरते कट के,
जाने कितने लाख हजार।।

पीस रहे चटनी के जैसे,
सैनिक तोप सभी हथियार।
दानव भी थर्राये पल भर,
ऐसा था भीषण संहार।।

नौ सौ ने थे प्राण गँवाये,
तेरा सौ को कर के कैद।
कितने प्राण पखेरू उड़ते,
देख अचंभित सारे बैद।।

वीरों ने इतिहास रचा पर,
भूल गए उनको सब लोग।
ऐसे ही पापों को धोने,
आता है कोरोना रोग।।

इजरायल नतमस्तक होकर,
लेता है भारत का नाम।
अपने हिय में रखते जीवित,
राजपुताना का वो धाम।।

शत शत वंदन करलो उनका,
जिनके दम पर है अभिमान।
बच्चों का है फर्ज बचाना,
अपने पुरखों का सम्मान।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

रविवार, 23 मई 2021

मन की बात / ओछी सरकार


 *मन की बात*


धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार

किसी छिछोरै प्रेमी जैसी

स्वप्न दिखा ठगती हर बार


बुलट ट्रेन की आस दिलाकर

हँसते देखो सायकल छीन

नाचे नग्न नर्तकी जैसे

माइकल खुद को समझे दीन

अपनी बीवी विधवा कर के

बनते दुनिया के भरतार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


बाँट चवन्नी कहते रुपया

हरिश्चंद्र की ये औलाद

टकरा कर हर आँसू रोया

ऐसा है सीना फौलाद

महँगाई का खीँचे फंदा

बोले गाओ राग मल्हार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


अच्छे दिन का शौक मिट गया

दिनभर ढूँढें रोटी नून

पहले तीन बार खाते थे

अब पाते हैं बस दो जून

घूँघट काढ़े मर्द घूमते

बन्द हुए सारे व्यापार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


अंध भक्त को करते वंदन

मुख से झरते जिनके फूल

कैसे पिघला लेते हैं ये

अंतस में चुभता हर शूल

बस जुमले की टॉफी बाँटे

मिथ आश्वासन की भरमार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


भय लगता है कुछ कहने से

कुत्तों की सुनकर हुंकार

बिना सत्य जाने करते हैं

इनके चेले नरसंहार

देवों ने नत मस्तक होकर

बंद किये अपने दरबार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


कितना नेह लगाया तुमसे

पूज रहा था ये संसार

गिरगिट जैसे रंग बदलते

दैत्य बना है तारणहार

भूल हुई विश्वास किया जो

अब गर्दन पर है तलवार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


नीतू ठाकुर 'विदुषी'

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

एक छंद मेरे नाम है .. विदुषी


 

एक छंद मेरे नाम है

संजय कौशिक 'विज्ञात' जी द्वारा निर्मित 

'विदुषी छंद

विदुषी छंद का शिल्प विधान ■ 

वार्णिक छंद है जिसकी मापनी और गण निम्न प्रकार से रहेंगे यह दो पंक्ति और चार चरण का छंद है जिसमें 6,8 वर्ण पर यति रहेगी। सम चरण के तुकांत समान्त रहेंगे इस छंद में 11,14 मात्राओं का निर्धारण 6, 8 वर्णों में है किसी भी गुरु को लघु लिखने की छूट है इस छंद में लघु का स्थान सुनिश्चित है। लघु जहाँ है वहीं पर स्पष्ट आना चाहिए। मापनी का वाचिक रूप मान्य होगा।

मापनी ~

221 222

212 212  22

तगण मगण

रगण रगण गुरु गुरु (गा गा)

उदाहरण -

जटायु जी को समर्पित एक छंद देखें .......

आकाश का गामी
भू पखेरू पड़ा देखा।
संताप से रोता
राम के नेह का लेखा।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

छंदों के महासागर में एक छंद अपने नाम होने का मूल्य एक छंदकार ही समझ सकता है। आज से वर्षों पहले आत्मसुखाय लेखन करती लेखनी छंद की परिभाषा से भी अनभिज्ञ थी। स्वर रहित हाइकु लोक में विचरण करते मन ने यह कभी नही सोचा था कि कलम कभी मापनी की पटरी पर दौड़ लगाएगी और गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी जैसे छंद मर्मज्ञ के सानिध्य में न केवल छंदों पर सृजन होगा अपितु एक छंद भी मेरे नाम होगा।

हनुमान जयंती के पावन अवसर पर गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी ने 106 नूतन छंदों का निर्माण किया और और उनका नामकरण कलम की सुगंध परिवार के उन कलमकारों के नाम किया गया जिन्होंने गुरुदेव से आशीर्वाद स्वरूप उपनाम लिए थे। पूरे परिवार के लिए यह अविस्मरणीय क्षण किसी पर्व से कम नही था। कल्पना से परे इस यथार्थ ने एक अद्भुत हर्ष की अनुभूति की जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। "विदुषी छंद" यह ऐसा बहुमूल्य उपहार है जो आजीवन मेरे साथ रहेगा और मैं पूर्ण प्रयास करूँगी की गुरुदेव की इस धरोहर को न केवल सुरक्षित रखूं बल्कि उसकी सुगंध को हर ओर फैलाऊँ।

ईश्वर की असीम अनुकम्पा ही थी जो आदरणीया पम्मी सिंह जी के माध्यम से मैं कलम की सुगंध परिवार से जुड़ी।  इस मंच ने मेरी लेखनी को एक नई दिशा दी सखी कुसुम जी, यथार्थ जी, गीतांजलि जी, अनिता जी, अनुराधा जी, अभिलाषा जी, आरती जी, पूनम जी, सरोज जी, अमिता जी, दीपिका जी, सरला जी, मीता जी, इन्द्राणी जी, धनेश्वरी जी, श्वेता जी, अनुपमा जी, कंचन जी, मीना जी, मंजुला जी इन सभी के साथ ने हर कठिन विषय को सरल कर दिया। हँसते खेलते छंद मुक्त लेखनी कब छंदबद्ध हो गई समझ ही नही आया। आदरणीय बाबूलाल शर्मा बौहरा विज्ञ जी, परमजीत सिंह कोविद जी, कन्हैया लाल श्रीवास आस जी, अनंत पुरोहित अनंत जी, सौरभ प्रभात जी, कौशल शुक्ला जी, गणेश थपलियाल जी इनके लेखन ने सदैव लेखनी को प्रेरित किया।

गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी का आभार व्यक्त करने के लिए शब्दकोश छोटा पड़ जाता है हमारा। उनकी असीम अनुकम्पा से मेरी मृत पड़ी लेखनी पुनर्जीवित हो उठी। उनके अथक प्रयास का परिणाम है मेरा लिखा हर शब्द.....पूर्व जन्मों का पुण्य ही होगा जो इस कलयुग में इतने श्रेष्ठ और ज्ञानी साहित्य के साधक की छत्रछाया प्राप्त हुई। उनका स्नेहाशीष सदैव मिलता रहे यही प्रार्थना ईश्वर से प्रतिदिन करती हूँ। हम इस योग्य नही की गुरु को गुरुदक्षिणा दे सकें पर उनके द्वारा प्राप्त ज्ञान को अपनी कलम में उतारने का प्रयास अवश्य कर सकते हैं। उनके निर्मित छंदों को हम अपने भावों का रस पिलाकर वटवृक्ष बना सके तो यह हमारे जीवन की सार्थकता होगी। आपनी साधना का फल उन्होंने हम नवांकुरों को सौंपा है यह उनकी उदारता का प्रतीक है।

विदुषी छंद शतक शीघ्र ही गुरुदेव को समर्पित कर सकूँ इस लिए प्रयास रत हूँ और आप सभी से यही निवेदन है कि आप सब भी अवश्य प्रयास करें 🙏

नीतू ठाकुर 'विदुषी'




शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

विज्ञात आपके गीतों ने ...नीतू ठाकुर 'विदुषी'


 गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी की निरंतर साहित्य साधना और उत्कृष्ट सृजन को समर्पित मेरे शब्द सुमन ....मैं इस योग्य तो नही की शब्दों में उन्हें समाहित कर पाऊं पर एक प्रयास🙏

विज्ञात आपके गीतों ने 

मात्रिक मापनी ~ मुखडा 16/14 अन्तरा 16/16


वर्तमान के फूहड़पन की 

मर्यादा को बाँध लिया

विज्ञात आपके गीतों ने 

एक साहसिक काम किया।।


अलंकार बिन बनी अभागन

मुखपोथी पर नाचे कविता

करे कलंकित काव्य शास्त्र जो

खतरे में कविता की भविता

ऐसे में नव शिल्प गढ़ा वो

भावों के जो नाम दिया।।


छंद अनाथ हुए से दिखते

गिनते थे अंतिम साँसों को

पीपल नीम नीर को तरसे

लोग पूजते थे बाँसों को

बंदीगृह से मुक्त कराकर

नव छंदों से घाव सिया


स्वार्थ रहित साहित्य साधना

नवांकुरों को यूँ उपजाया

भाषाओं की खिचड़ी त्यागी

दमकी फिर हिन्दी की काया

शीश झुके श्रम देख निरंतर

भाव बाँधता नित्य हिया


नवरस छलक रहे वर्णों से

शब्दों के जब अर्थ महकते

मौन त्याग कर खिली लेखनी

उगले अब अंगार दहकते

लेखन का उद्देश्य समर्पण

हर्ष बाँट जो गरल पिया


नीतू ठाकुर 'विदुषी'




आँखे भर-भर आती है....नीतू ठाकुर 'विदुषी'

 गीत  आँखे भर-भर आती है नीतू ठाकुर 'विदुषी' कितने किस्से रक्त सने से, आँखे भर-भर आती है। अश्रु धार फिर कण्टक पथ का, जल अभिषेक कराती ...