सोमवार, 15 जनवरी 2018

इजहार....नीतू ठाकुर


हाथ में हथकड़ी पाओं में बेड़ियाँ 
मै मोहब्बत में तेरे गिरफ़्तार हूँ

जिसको बरसों तलाशा है दिल ने तेरे 
सामने तेरे हमदम वही प्यार हूँ 

जीत कर दिल मेरा मुस्कुराये थे तुम 
जो बचा न सकी दिल वही हार हूँ 

जिसकी खातिर यूँ बेचैन अब तक रहे 
पहली चाहत का पहला मै इजहार हूँ

छोड़ कर दो जहाँ तोड़ कर बंदिशे
जो बसाने चले हो वो संसार हूँ

जिसको माँगा था तुमने दुआओं में वो 
मै हकीकत हूँ तेरी तलबगार हूँ 
                 - नीतू ठाकुर 


शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

ज़िंदगी के पास एक उम्मीद होनी चाहिए.....नीतू ठाकुर


गर्म बिस्तर में सुनहरे ख्वाब बुनता है जहाँ 
सरहदों पर जान की बाजी लगाते नौजवान  
जागते है रात भर की जान बचनी चाहिए 
दुश्मनों से धरती माँ की आन बचनी चाहिए 

बेरहम मौसम हुआ तो चल पड़ी कातिल हवाएँ 
बर्फ की चादर लपेटे ज़िंदगी से खेलने 
चुभ रहे थे बर्फ के नश्तर सभी के जिस्म में 
अब तलक बाकी है जाने कितने मौसम झेलने 

एक अलाव रात भर जलता रहा इस आस में 
ज़िंदगी के पास एक उम्मीद होनी चाहिए 
जम रहा था खून का हर एक कतरा जिस्म में  
बेजान होते जिस्म में कुछ साँस होनी चाहिए 

बर्फ के गोलों से मिटती भूख मिटती प्यास को 
जान बाकी है यही एहसास होना चाहिए 
जान दुनिया पर लुटाने की जरूरत तो नहीं 
उनके जैसा एक जज्बा पास होना चाहिए 

                            - नीतू ठाकुर 

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

तेरे जाने के बाद ....नीतू ठाकुर


क्या जी उठूंगी तेरे आँसुओं से 
क्या खेल पाओगे कभी मेरे गेसुओं से

ढूंढ़ने निकले हो हमको दफ़न हो जाने के बाद 
निशान नहीं मिलते है साहब दिल जलाने के बाद

मुद्दतों तेरी याद में तड़पता रहा है दिल 
वक़्त जाया न कर हस्ती मिटाने के बाद

किसी पत्थर से दिल लगा बैठे थे हम 
बहुत मुस्कुराये थे तुम हमको रुलाने के बाद

वक़्त की मार से कोई नहीं बचता 
कीमत समझ आई तुम्हें मोहब्बत खो जाने के बाद

कितने झूठे ख्वाब मेरे आँसुओं में बह गये 
आज भी आँखे है नम तेरे साथ मुस्कुराने के बाद

कितनी शिद्दत से तुम्हें चाहा था मेरे प्यार ने 
कुछ भी नहीं बचा था दिल तुझ पर लुटाने के बाद

इस कदर मुँह मोड़कर गुजरे थे तुम हमदम मेरे 
बहुत तड़पा था मेरा दिल तेरे जाने के बाद 
                - नीतू ठाकुर 

रविवार, 7 जनवरी 2018

किसी ने ज़िंदगी गँवाई थी ...नीतू ठाकुर


खून से लथपथ बेजान जिस्म 
रास्ते के किनारे पड़ा था 
मंजर बता रहा था वो मौत से लड़ा था 
टूटे हुए जिस्म के बिखरे हुए हिस्से 
कांच के टुकड़ों की तरह बेबस पड़े थे 
बहता हुआ लहू चीख चीख  कर दे रहा था गवाही 
हम भी कभी इस जिस्म से जुड़े थे 
दर्द से चीखती आँखे बहुत छटपटाई थी 
कोई तो बात थी जो लबों तक आई थी 
पर कौन सुनता उसकी दर्द भरी पुकार 
हर तरफ सन्नाटा और गहरी तन्हाई थी 
एक मासूम जिंदगी चार चक्कों में समाई थी 
जश्न के नशे में चूर अमीरजादों को 
गरीबी कहाँ नजर आई थी 
उनके लिए एक हादसा था 
किसी ने ज़िंदगी गँवाई थी 
पथराई आँखों से घूरती वो माँ 
पिता ने तो अपनी सुध ही बिसराई थी 
कितना मासूम और होनहार था मेरा लाल 
फिर किसने उसकी ये हालत बनाई थी 
छूता नहीं था शराब को दूर ही रहता था 
उसी शराब ने आज उसकी ज़िंदगी चुराई थी 
किसी का जश्न किसी के लिए 
मौत का पैगाम बन कर आई थी 
किसी ने होश खोया था 
किसी ने ज़िंदगी गँवाई थी 
साल के साथ साथ किसी के 
खुशियों की बिदाई थी 
          - नीतू ठाकुर 

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

जब तक मेरा दर्द बिकता रहा... नीतू ठाकुर


जब तक मेरा दर्द बिकता रहा 
मै अश्कों की स्याही से लिखता रहा 
डर लगता था कहीं बेमोल न हो जाऊँ 
इसलिए यादों की चक्की में पिसता रहा 
जाता रहा दफ़न यादों के बेदर्द शहर में 
जहाँ का हर पल मुझे चुभता रहा 
छिपता रहा खुशियों से
कहीं हस्ती न मिट जाये
दर्द के समंदर में बार बार डूबता रहा 
तन्हाइयों में डूब करमिटाकर खुशियों को 
अपने ही जख्मों को नोचता रहा 
बेनूर जिस्म पथराई आँखे 
दिल से लहू हर पल रिसता रहा 
ऐसी सनक सवार थी ज़िंदगी मिट रही थी 
मै ज़िंदगी से पल पल सीखता  रहा 
लोग वाह वाही करते रहे मेरे जख्मों पर 
मेरा दिल अंदर से चीखता रहा 
जब तक मेरा दर्द बिकता रहा 
मै अश्कों की स्याही से लिखता रहा 

- नीतू ठाकुर 


गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

क्या पत्थर ही बन जाओगे ....नीतू ठाकुर

 सूखे पत्ते बंजर धरती 
क्या नजर नहीं आती तुमको 
ये बेजुबान भूखे प्यासे 
क्या खुश कर पायेंगे तुमको 
हे इंद्रदेव, हे वरुणदेव 
किस भोग विलास में खोये हो 
या किसी अप्सरा की गोदी में 
सर रखकर तुम सोये हो  
करते है स्तुति गान तेरा 
अब तो बादल बरसाओ ना 
तुम देव हो ये न भूलो तुम 
कुछ तो करतब दिखलाओ ना 
अंधे बनकर बैठे त्रिदेव 
विपदा को पल पल देख रहे 
अब कौन बचाने जायेगा 
मन ही मन में यह सोच रहे 
पत्थर की पूजा करते हैं 
क्या पत्थर ही बन जाओगे 
या कृपा करोगे दुनिया पर 
जलधारा भी बरसाओगे 
कर जोड़ करें तुमसे विनती 
अब और कहर बरसाओ ना 
तुम दया करो हम पर स्वामी 
बारिश बनकर फिर आओ ना 

            - नीतू ठाकुर 

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

तुम्हें मेरी याद आयेगी न ?...नीतू ठाकुर

सच कहो तुम्हें मेरी याद आयेगी न ?
मेरे साथ हर पल जिया है तूने 
तेरे गम और ख़ुशी का साक्षीदार हूँ मै 
आज आकर इस आखरी मक़ाम पर 
बहुत बेबस और लाचार हूँ मै 
मिटना ही मुकद्दर था चंद सांसे ही बची हैं 
और तेरे चेहरे पर अनजानी हंसी है 
देखता हूँ मौन खड़ा इन खुशियों के बाजार को 
भुला रहे हैं सब लोग मुझ जैसे बेकार को 
सब को इंतजार है आने वाले कल का 
किसको है ख्याल इस मिट रहे पल का 
मिट रहा हूँ पल पल किसी को गम नहीं 
तुम कहते हो वक़्त बेरहम है क्या  तुम बेरहम नहीं ? 
कितना कुछ पाया है मेरी सोहबत में तुमने 
सब कुछ भुला दिया तुमने एक दिन में 
देखते ही देख़ते काल में समा जाऊँगा 
बस एक तारीख बन कर रह जाऊँगा 
तुम्हारा इंतजार करूँगा तुम्हे बुलाऊँगा 
बस एक बार आवाज देना दौड़ा चला आऊँगा 
तुम्हें अपने साथ बीते कल में ले जाऊँगा 
दो पल के लिए ही सही तुमसे मिलकर मुस्कुराऊंगा 
सच कहो तुम्हें मेरी याद आयेगी न ?

           -  नीतू ठाकुर 



इजहार....नीतू ठाकुर

हाथ में हथकड़ी पाओं में बेड़ियाँ  मै मोहब्बत में तेरे गिरफ़्तार हूँ जिसको बरसों तलाशा है दिल ने तेरे  सामने तेरे हमदम वही प्यार हूँ...