नवगीत
मधुमास
नीतू ठाकुर 'विदुषी'
मापनी 13/11
विरह अग्नि दहके बदन
भटक रही थी श्वास
आज प्राण अटके हुये
ढूंढे एक उजास
1
कलियों का गुंजन सुना
भ्रमर महकते खूब
शुष्क नहीं तृण एक फिर
चमक उठी हर दूब
लदी खड़ी वह मंजरी
दृश्य मनोरम पास
2
नृत्य मोर का देखता
हरा भरा उद्यान
पैर देख आहत हुए
गूँगा कोकिल गान
तितली पंख पसारती
पाकर प्रिय आभास
3
पुलकित हर्षित है नलिन
करता कीच विलाप
विरह बाण की चोट से
मन करता संताप
*उमड़ घुमड़ छाता रहा*
*हृदय प्रीत मधुमास*
4
मधुमासी बहती हवा
छेड़ रही है राग
चंदन से लिपटे हुये
पूछ रहे कुछ नाग
शान्त चित्त होता तभी
मिले अगर विश्वास ।।
नीतू ठाकुर 'विदुषी'
