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सोमवार, 12 मार्च 2018

आखरी वो सिसकियाँ.....नीतू ठाकुर



रेशमी चादर में लिपटी 
आखरी वो सिसकियाँ 
सूखते अश्कों से जाने 
कितना कुछ कहती रही 
एक कोना ना मिला 
छुपने को उसको मौत से 
आज परछाई से भी 
डरती रही छुपती रही 
याद करती परिजनों को 
वेदना से भर रही 
बीते लम्हों की चिता 
जलती रही बुझती रही 
जिंदगी के पृष्ठ पलटे जा रहा 
व्याकुल ये मन 
आखरी लम्हों में सारी 
जिंदगी भरती रही 
यादों के झोके उसे छूकर गए 
कुछ इस कदर 
भूल कर सारी व्यथा 
हसती रही रोती रही 
दर्द की है इंतहा 
ये आखरी तन्हा सफर 
जिंदगी की डोर जिसमें 
हर घडी कटती रही   
छोड़ कर जाना है सबको 
कैसे हो मंजूर उसको 
आखरी सांसों तलक 
वो मौत से लड़ती रही 
      
      - नीतू ठाकुर   




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