गुरुवार, 23 नवंबर 2017

आँसुओं से लिखी ग़ज़ल...नीतू ठाकुर


आँसुओं से लिखी ग़ज़ल हमने, 
मेरे हमदम तेरी कहानी है,
अश्क़ टपके जो मेरी आँखों से, 
लोग सोचेंगे ये दीवानी है, 

वादा करना और मुकर जाना 
तेरी आदत बहुत पुरानी है 
फिर भी तुझ पर यकीन करता है 
ये तो दिल की मेरे नादानी है 

क्या करेंगे तुम्हारी दौलत का 
मिट रही हर घडी जवानी है 
मै जो कहती हूँ लौट आवो तुम 
मेरी तन्हाईयाँ बेमानी है 

लड़खड़ाते हुए कदम तेरे 
मेरी चाहत की ही नाकामी है 
मिट रही हर घडी मोहब्बत को 
अब तो यादों को ही बचानी है 

                    - नीतू ठाकुर 
                  

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

छोड़ के मथुरा-काशी...नीतू ठाकुर


आन बसों तुम मोरी नगरिया,
हे घट घट के वासी
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी
कान्हा तुम हो प्यार का सागर,
फिर क्यूँ  सुनी मोरी गागर,
कौन कसूर भयो रे मोसे,
जो मै रह गई प्यासी,
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी
जिन नैनों में कृष्ण बसे हों,
उन नैनों में कौन समाये,
नैना तेरे दरस को तरसे,
पागल मन कैसे समझायें,
एक झलक दिखला दो कन्हैया,
कर दो दूर उदासी,
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी
तुम तो हो छलिया बनवारी,
नैन मिलाके सब कुछ हारी,
तुम बैठे मथुरा में जाकर,
मन रोये अब रतिया सारी,
रोते रोते प्राण तजूँगी,
देर ना करना जरासी, 
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी     
सूना मधुबन, सुना पनघट,
आज ना मै छोडूंगी ये हठ,
हर पल तेरी याद सताये,
कान्हा तुम कैसे बिसराये,
तुम हो गोकुल वासी 
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी
- नीतू ठाकुर 
 
           



बुधवार, 15 नवंबर 2017

मायके में बिटिया रानी...नीतू ठाकुर


पलकों को आँचल से पोछा,
चेहरे पर मुस्कान सजाई,
जब देखी आंगन में मैंने,
अपने बाबुल की परछाई,
बार बार घड़ी को देखे,
जैसे समय को नाप रहे थे,
पल में अन्दर पल में बहार,
रस्ते को ही झाँक रहे थे,
देख मुझे सुध-बुध बिसराये,
घर के अन्दर ऐसे भागे,
जैसे उन बूढ़े पैरों में,
नये नवेले चक्के लागे,
भाग के आई मैया मेरी,
हाथों में एक थाल सजाये,
आँखों में ख़ुशी के आँसू,
दिल में कई अरमान बसाये,
चारों तरफ ख़ुशी का आलम,
कलियों पर मुस्कान सी छाई,
जैसे पूछ रहा था आंगन , 
बिटिया बरसों बाद तू आई,
कितना दे दें कितना कर दें,
दामन को खुशियों से भर दें,
मेरा सुख-दुःख बाँट रहे थे,
एक दूजे को डांट रहे थे,  
एक बूँद भी आ ना पाये,
उसकी आँखों से अब पानी,
बरसों बाद लौट कर आई,
है जब मेरी बिटिया रानी,
उनके मन में ऐसे बसी थी,
जैसे तन में प्राण समाये,
फिर क्यों वहाँ ना पाये इज्जत,
जिनकी खातिर उम्र बिताये ? 
              -नीतू ठाकुर        
  
          
        

शनिवार, 11 नवंबर 2017

कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया.....नीतू ठाकुर

कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया,
सोलह शृंगार से तन सजा तो लिया ,
संग तुम ले गये हो हमारा जिया,
बनके दीपक मै जलती रही रात भर,
एक पल भी हटी ना हमारी नजर,
इस तरह घिर के आई थी काली घटा ,
ऐसा लगता था जैसे ना होगी सहर

कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया...

प्रीत की रीत हमने निभाई मगर,
क्यों ना बन पाई प्रीतम तेरी हमसफ़र,
राह तकते हुए प्राण त्यागेगा तन,
फिर भी होगी ना तुमको हमारी खबर

कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया...

सज गई हर गली सज गया है शहर,
फिर भी खुशियों का होता नहीं क्यों असर,
आस मिलने की लेकर मै निकली मगर,
ये ना जानू की क्या होगा मेरा हशर,
कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया...
- नीतू ठाकुर

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

मन का क्रंदन... नीतू ठाकुर


 
हार जाती हूँ , टूट जाती हूँ,
रूठ जाती हूँ खुद से,
जब समझ नहीं आता, 
किस्मत क्या चाहती है मुझसे, 
मिटती है उम्मीदे,
टूटते है सपने,
पराये से लगते है
सब लोग अपने,
गिरती हूँ ,संभालती हूँ,
घुटती  हूँ हर पल,
फिर भी मन कहता है,
अभी थोड़ा और चल,
कशमकश में गुजरी है
मेरी सारी ज़िंदगी,
क्यों करूँ भला मै
किसी और की बंदगी,
क्यों हो मेरे जीवन पर 
किसी और का अधिकार,
हो नहीं सकता मुझे 
दासत्व स्वीकार,
क्यों मै कतरू पंख अपने,
बांध लूँ मै बेड़ियाँ, 
क्यों रहे खामोश ये लब, 
मंजिलों से दूरियाँ ,
क्यों फसूं मै बेवजह ही, 
रीतियों के जाल में,
जब मेरे अपने ही मुझको,
ला रहे इस हाल में,
कर लूँ आज मुक्त मन को,
इस जहाँ के बंधनो से,
जब नहीं होता है आहत,
कोई मन के क्रंदनों से , 

-नीतू रजनीश ठाकुर 



   
  
   
   

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

रानी पदमावती....नीतू ठाकुर

एक हाथ में विष का प्याला 
एक हाथ में धरी कटार 
आज तजेंगे प्राण मगर 
दुश्मन से ना मानेंगे हार 
क्या समझ रहे थे तुम अबला 
जो हाथों में आ जायेंगे 
हम वीर शेरनी की जाई 
हम तुमको धुल चटायेंगे 
है लाज शरम गहना माना 
घूँघट में शीश छुपाते है 
पर वक़्त पड़े तो बन काली 
रण में तलवार चलाते है 
नासमझ समझ का फेर है ये 
हम दास तेरे हो जायेंगे 
यदि वक़्त पड़ा तो अग्नि पे 
जौहर का खेल दिखायेंगे 
ये हिन्द देश की छत्राणी 
ना कदम हटायेंगी पीछे 
तू कदम बढ़ा के देख जरा 
कुचलेंगें तलवों के निचे 
तुझ जैसे नीच नराधम को 
हम कभी शरण ना आयेंगे  
पग आज बढ़ा के देख जरा 
तुझको औकात दिखायेंगे 
राज महल की दीवारों को 
हम शमशान बनायेंगे 
धरती माँ की आन की खातिर 
अपनी चिता जलायेंगे 
शर्म लुटाके जीने से 
बेहतर होती है वीरगती 
जब तक थे तन में प्राण 
यही कह रही थी रानी पदमावती    
   -नीतू ठाकुर 




चित्र बनते काव्य जो...विपदा @ नीतू ठाकुर 'विदुषी'

गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी के मार्गदर्शन में कलम की सुगंध कुटुंब द्वारा आयोजित चित्राधारित काव्य प्रतियोगिता हेतु.... चित्र बनत...