डर व्याप्त सदा हो जिस मन में,
जीवित वो मृतक समान लगे,
कुंठा से मन व्याकुल प्रति पल,
कैसे सुंदर ये जहान लगे ,
भयभीत ह्रदय, विचलित लोचन,
कर्तव्य क्षीण हो क्षण प्रति क्षण,
सब लुप्त हुए हर गुण-अवगुण,
गुणवान भुला बैठे हर प्रण ,
क्यों करें गुलामी धनिकों की,
क्यों स्वाभिमान का नाश करें,
क्यों इतने सस्ते हो जायें की,
ये दुनिया उपहास करे,
नस नस में जोश समाया है,
ये क्यों तुमने बिसराया है ,
ना जाने कितने पुण्य कर्म से,
मानव तन को पाया है,
ईश्वर है हर पल साथ तेरे,
फिर क्यों ऐसे भरमाया है,
लड़ता है जो अपने डर से,
उसने ही जीवन पाया है,
उत्साह भरो जीवन में तुम,
नव जीवन का आगाज करो,
इंसान हो तो इंसान रहो,
अपने जीवन पर नाज करो,
मृत्यू से यदि भय लगता है,
तो जीने का अधिकार नही,
यूँ घुट घुट कर जीवन यापन,
मानवता को स्वीकार नही ,
धरती से लेकर अंबर तक,
यह शंख नाद पहुँचाना है,
अब भय को हमसे भय लागे,
ऐसा निर्भीक बनाना है,
- नीतू ठाकुर
