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शुक्रवार, 6 मार्च 2020

तंग होली ... नीतू ठाकुर 'विदुषी


नवगीत
तंग होली
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी ~16,14

आँखों में चुभते से दिखते, 
होली के क्यों रंग सभी।
नेत्र बहाते सूखे आँसू,
धड़कन करती तंग सभी।

1
श्वेत वस्त्र में लिपटे तन को,
अब रंगों की चाह नही।
पहुँच सके वो अपने प्रिय तक,
दिखती कोई राह नही।

जला चुका जब मन आशाएं,
जली चिता के ढंग सभी।
आँखों में चुभते से दिखते, 
होली के क्यों रंग सभी।

2
व्याकुल से विक्षिप्त ह्रुदय ने,
सावन को जलते देखा।
जाने कितनी शंकाओं को,
आँखों ने पलते देखा।

कहने भर को जीवित है पर,
जीवन है बेरंग सभी।
आँखों में चुभते से दिखते, 
होली के क्यों रंग सभी।

3
शून्य हो गया जीवन सारा,
ख़ुशियों से नाता टूटा।
चीख उठी तब मौन वेदना,
जीवन जग से है रूठा।

शेष नहीं है अब अभिलाषा,
जलती इच्छा संग सभी।
आँखों में चुभते से दिखते, 
होली के क्यों रंग सभी।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

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