खून से लथपथ बेजान जिस्म
रास्ते के किनारे पड़ा था
मंजर बता रहा था वो मौत से लड़ा था
टूटे हुए जिस्म के बिखरे हुए हिस्से
कांच के टुकड़ों की तरह बेबस पड़े थे
बहता हुआ लहू चीख चीख कर दे रहा था गवाही
हम भी कभी इस जिस्म से जुड़े थे
दर्द से चीखती आँखे बहुत छटपटाई थी
कोई तो बात थी जो लबों तक आई थी
पर कौन सुनता उसकी दर्द भरी पुकार
हर तरफ सन्नाटा और गहरी तन्हाई थी
एक मासूम जिंदगी चार चक्कों में समाई थी
जश्न के नशे में चूर अमीरजादों को
गरीबी कहाँ नजर आई थी
उनके लिए एक हादसा था
किसी ने ज़िंदगी गँवाई थी
पथराई आँखों से घूरती वो माँ
पिता ने तो अपनी सुध ही बिसराई थी
कितना मासूम और होनहार था मेरा लाल
फिर किसने उसकी ये हालत बनाई थी
छूता नहीं था शराब को दूर ही रहता था
उसी शराब ने आज उसकी ज़िंदगी चुराई थी
किसी का जश्न किसी के लिए
मौत का पैगाम बन कर आई थी
किसी ने होश खोया था
किसी ने ज़िंदगी गँवाई थी
साल के साथ साथ किसी के
खुशियों की बिदाई थी
- नीतू ठाकुर
