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मंगलवार, 24 मार्च 2020

कोरोना: नीतू ठाकुर 'विदुषी'


नवगीत
कोरोना 
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी~ 16/16

कैद हुये पिंजरे में पँछी,
आज विषैली चली हवाएं।
पग आहट को सड़कें तरसी, 
गूंज रही गलियों में आहें॥

1
हुए अछूते अपने प्रियजन,
आँख दूर से बरस रही है।
उँगली की कंपन कहती है,
आज छुअन को तरस रही है।
ईद होलिका स्मृतियाँ जागी
मिलने को अब तरसी बाहें

2
पूछ रही भारत की गलियाँ, 
लक्ष्मण रेखा खींची किसने। 
देख लॉक डाउन के रस्ते, 
शांत डगर गुंजाई जिसने।
कागे बोल रहे थे जिस पथ,
कोयल कूक सुनना चाहें

3
कटे कटे सब लोग लगें अब,
बैर बिना भी उच्च दूरियाँ।
लाशों के अंबार लगे पर,
स्वतंत्रता पर चलती छुरियाँ।
बिना कफ़न मृत देह पड़े है,
बाट निहारे कब दफनाएं।

4
अखबारों की सुर्खी बनते,
जब रोगी के प्राण हैं हरते।
रोग शत्रु कोरोना भीषण,
नाम मात्र सुनकर सब डरते।
अंतिम दर्शन बिन जग छूटा,
नीर बहाती व्याकुलताएँ।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

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