google-site-verification: google596994c475cff8d2.html MAN SE- Nitu Thakur : नही जानती हूँ मै उसको....नीतू ठाकुर

सोमवार, 7 मई 2018

नही जानती हूँ मै उसको....नीतू ठाकुर


नही जानती हूँ मै  उसको 
जिसने ये ब्रह्माण्ड  बनाया 
अगणित रंग बिखेरे जिसने 
सुंदरता का अर्थ बताया 

दूर तलक फैले अंबर को 
चंद्र ,सूर्य, तारों से सजाया 
अग्नि ,जल, वायू ,पृथ्वी दे 
जग को रहने योग्य बनाया 

नही जानती हूँ मै उसको 
जिसने सप्त सुरों को जाया 
पत्थर में भी ध्वनी बसाई 
सब के तन में प्राण समाया 

पर जो भी है वो शक्तिमान है 
जिसका गुण तो सिर्फ दान है 
ढूंढ नही पाये हम उसको  
कारण उसका अल्प ज्ञान है 

स्वार्थ में डूबा लोभ नही जो 
जबरन खुद को श्रेष्ठ बताये 
छोड़ दे जग में तन्हा उसको 
जो उसकी स्तुति न गाये  

इतना सूक्ष्म नही हो सकता 
जो धर्मों में बंटता जाये 
खुद की सत्ता स्थापन हेतु 
हमको अपना दास बनाये 

इतना क्रूर नही हो सकता 
किसी की अस्मत दांव लगाये  
उल्टे -सीधे नियम बनाकर 
जग में अपना भय फैलाये 

भेद भाव से सदा परे है 
कभी किसी का धर्म न पूछे 
पशु ,पक्षी या वृक्ष, लतायें 
सब को एक सरीखा सींचे 

कुछ तो सोच रहा होगा वो 
देख के पागल दुनिया नीचे 
रक्षण हेतु सदा है तत्पर 
चाहे हम उसको न पूंछे 

    - नीतू ठाकुर 


26 टिप्‍पणियां:

  1. अरे वाह! बहुत सुन्दर रचना!!!

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    1. आदरणीय बहुत बहुत शुक्रिया आप का इस प्रतिक्रिया के लिए।

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  2. वाह्ह्ह.... बहुत सुंदर रचना प्रिय नीतू,
    सत्य का आईना दिखलाती एक सार्थक संदेश देती सुंदर रचना👌👌👌

    ईश्वर ने इंसान बनाया, इंसानों ने धर्म
    धर्म की आड़ में प्रपंच रचे,ये कैसा है कर्म?

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    1. बहुत बहुत आभार सखी श्वेता जी... शानदार प्रतिक्रिया ।

      हटाएं
  3. वाह्ह्ह.... बहुत सुंदर रचना प्रिय नीतू,
    सत्य का आईना दिखलाती एक सार्थक संदेश देती सुंदर रचना👌👌👌

    ईश्वर ने इंसान बनाया, इंसानों ने धर्म
    धर्म की आड़ में प्रपंच रचे,ये कैसा है कर्म?

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    1. बहुत बहुत आभार सखी श्वेता जी।

      हटाएं
  4. अति सुन्दर भाव सखी नीतू जी ....उस रचेता को अद्भुत भाव समर्पित करता लेखन बहुत खूब

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    1. बहुत बहुत आभार सखी
      बहुत सुन्दर प्रतिक्रिया दी आप ने रचना के मर्म को समझा ।

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  5. नही जानती हूँ मै उसको
    जिसने ये ब्रह्माण्ड बनाया
    अगणित रंग बिखेरे जिसने
    सुंदरता का अर्थ बताया
    .
    शुरुआत से लेकर कविता की अंतिम पंक्ति तक भाव और शब्द संयोजन लाज़वाब है, सरल शब्दों में तारीफ़ कर पाना संभव नहीं।
    ब्रह्मांड के मालिक के लिए प्रार्थना रूपी ये पंक्तियाँ वाकई बहुत ही उम्दा हैं। ईश कृपा दृष्टि बनाए रहें आपकी इस रचनात्मकता के प्रति। ढेरों शुभेच्छाएँ आपकी इस विशेष रचना के लिए आदरणीया...💐💐💐

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    1. बहुत बहुत आभार
      बहुत अच्छी प्रतिक्रिया... आप की प्रतिक्रिया बहुमूल्य है

      हटाएं
  6. सुंंदर शब्द और भाव उत्तम..
    बहुत बढिया लिखती है..

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार,
      आप की प्रतिक्रिया पढ़कर अपार हर्ष हुआ।

      हटाएं
  7. अनमोल भावो से सजी सुंदर रचना,अलब्ध और लब्ध की सूक्ष्म सीमा रेखा बताती है कि कही एक शक्ति है और आपने बहुत सुंदरता से उसे एक चेतावनी देकर समझाया।
    अतुलनीय रचना।

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    1. आप ने सराहा लेखन सार्थक हुआ। आभार सखी।
      शानदार प्रतिक्रिया हमेशा की तरह हौसला बढ़ा गई।

      हटाएं
  8. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (09-05-2018) को "जिन्ना का जिन्न" (चर्चा अंक-2965) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आदरणीया मेरी रचना को मान देने हेतु बहुत बहुत आभार।

      हटाएं
  9. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (09-05-2018) को "जिन्ना का जिन्न" (चर्चा अंक-2965) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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    उत्तर
    1. आदरणीया मेरी रचना को मान देने हेतु बहुत बहुत आभार।

      हटाएं
  10. नीतु,ईश्वर को बहुत ही सुंदर तरीके से व्यक्त किया हैं आपने।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार । सुन्दर प्रतिक्रिया।

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  11. उत्तर
    1. आभार सखी ....शानदार प्रतिक्रिया ।

      हटाएं
  12. उत्तर
    1. आभार सखी।
      प्रतिक्रिया हौसला बढ़ा गई।

      हटाएं
  13. ईश्वरीय सत्ता को माँ लेना ही उचित होता है ..।
    वही है जो सब का संचालन करता है ... ऊपर बैठा सब देखता है ..
    सुंदर रचना है ...

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  14. खूबसूरत रचना ! बहुत खूब आदरणीया ।

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