सोमवार, 29 जनवरी 2018

दुनिया से छुपाऊँ क्यों ?....नीतू ठाकुर



मुकद्दर में भरें हैं ग़म, तो दुनिया से छुपाऊँ क्यों ?
मुझे मंजूर है किस्मत, तभी तो अश्क़ ढाऊँ मै

तेरी यादों के तकिये को, सिरहाने पे सजाऊँ मै,
उन्हीं के दम पे हूँ जिंदा, उन्हें क्यों भूल जाऊँ मै ?

बड़ी बेदर्द है दुनिया, मुझे जीने नहीं देगी, 
तेरे चाहत की जंजीरें, जहर पीने नहीं देंगी 

मै जीते जी मरी हूँ पर , तू मरकर दिल में जिंदा है, 
जुदा जिसने किया था वो, खुदा खुद पर शर्मिंदा है

तेरी यादों को इस दिल ने, लहू के संग मिलाया है ,
मिटा कर अपनी हस्ती को, खुदा तुमको बनाया है    
                                       
                                   - नीतू ठाकुर 

   

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

"तितली" नन्हे गुलशन की रानी..... नीतू ठाकुर



जल बिन सूख रहा था गुलशन 
तितली पल पल नीर बहाये 
जैसे गुलों में प्राण बसे हों 
ऐसे उनसे लिपटी जाये 
देख रही हर पल अंबर को 
शायद जलधारा दिख जाये 
पर नन्हे गुलशन की रानी 
जाकर विपदा किसे सुनए 
सूख गए आँखों के आंसू 
उडी गगन में पर फैलाये 
आज लड़ूंगी बदल से मै 
काहे इतनी देर लगाए ?
सूख रहा है मेरा गुलशन 
क्या तुमको वो नजर न आये ?
एक हवा का झोका आया 
तितली को संग चला उड़ाये 
संभल न पायी नन्ही तितली 
टूटे पंख बिखरते जायें 
गरज गरज कर बादल बरसे 
तितली के भी पंख भिगाये 
पड़ी धरा पर देखे तितली 
गुलों की तृष्णा मिटती जाये 
महक उठी फिर प्यासी धरती 
सोंधी खुशबू मन में समाये 
छोड़ चली दुनिया को तितली 
लेकिन गुलशन लियो बचाये 
            - नीतू ठाकुर 


गुरुवार, 25 जनवरी 2018

गणतंत्र दिवस मनाएंगे ... नीतू ठाकुर


हे धन्य धन्य भारत भूमी हम तुम्हें पूजते जाएंगे,  
वीर शहीदों को वंदन कर श्रद्धा सुमन चढ़ाएंगे, 
यह देश तिरंगा हो जाये हम इतने ध्वज फहराएंगे, 
इस हिंद देश की महिमा को द्विगुणित आज बनाएंगे, 
इस देश का पावन पर्व है ये गणतंत्र दिवस मनाएंगे...

न जाने कितने ही ज्ञानी इस धरती ने उपजाए है, 
अद्भुत सांस्कृतिक विरासत से उनको परवान चढ़ाये है, 
हम वीर शहीदों की गाथा को युगों युगों तक गाएंगे, 
जो भूल गए है देश प्रेम हम उनको याद दिलाएंगे, 
इस देश का पावन पर्व है ये गणतंत्र दिवस मनाएंगे...

इस पतित पावनी भूमि पर दुश्मन भी जिस दिन आएगा, 
नफरत का मंत्र भूलाकर वो इस मिटटी का हो जायेगा, 
 हम आज भुलाकर बैर सभी खुशियों को गले लगाएंगे, 
कोई नफरत की डोर न हो हम ऐसा देश बनाएंगे, 
इस देश का पावन पर्व है ये गणतंत्र दिवस मनाएंगे...

इस देश में कितनी बीमारी है नफरत,भूख,बेकारी है, 
पर धरती माँ का दोष नहीं ये हम सब की लाचारी है, 
आज नहीं तो कल मिलकर हम सारे कष्ट मिटायेंगे, 
इस धरती माँ की कीर्ति को हम दुनिया में फैलाएंगे,   
इस देश का पावन पर्व है ये गणतंत्र दिवस मनाएंगे...

है संविधान ताकत अपनी सच्चे मन से अपनाएंगे, 
आदर्श नागरिक बनकर हम भारत आदर्श बनाएंगे, 
हर संकट और समस्या से हम मिलजुलकर टकराएंगे, 
खाएंगे आज शपथ मन में जब राष्ट्रगीत हम गाएंगे, 
इस देश का पावन पर्व है ये गणतंत्र दिवस मनाएंगे...
                            - नीतू ठाकुर 

सोमवार, 22 जनवरी 2018

"बसंत" देखो ऋतूराज का आगमन हो गया....नीतू ठाकुर



इंद्रधनुषी ह्रदय का गगन हो गया 
देखो ऋतूराज का आगमन हो गया 

सारी मायूसियाँ अब विदा हो गई 
मातमी सारा मंजर फ़ना हो गया
घाव पतझड़ के फिर सारे भरने लगे 
खुशनुमा आज सारा चमन हो गया 

इंद्रधनुषी ह्रदय का गगन हो गया 
देखो ऋतूराज का आगमन हो गया 

धूप की न तपिश शीत का न प्रहार 
उनके आने से मौसम हुआ खुशग़वार 
नव सृजित खेत खलिहान, बन भी हरा 
फूलों से सज गई है ये सारी  धरा  

इंद्रधनुषी ह्रदय का गगन हो गया 
देखो ऋतूराज का आगमन हो गया 

हर तरफ आज ऋतू यूँ सुहानी हुई 
महकी महकी हवाएं दीवानी हुई 
आज कोयल ने छेड़ी है सरगम नई 
आज संध्या भी कितनी नूरानी हुई 

इंद्रधनुषी ह्रदय का गगन हो गया 
देखो ऋतूराज का आगमन हो गया 

                  - नीतू ठाकुर 





रविवार, 21 जनवरी 2018

आज भी माँ क़ब्र से लोरी सुनाती है मुझे....नीतू ठाकुर


सो रही है प्यार से मिट्टी की चादर ओढ़कर 
आज भी माँ क़ब्र से लोरी सुनाती है मुझे 

दूर अंबर में  बसेरा है मेरे माँ का मगर 
आज भी वो दिल के कोने में बसाती है मुझे

भूख से बेज़ार होकर जब पुकारा है उसे
भीगी पलकों से निहारे थपथपाती है मुझे 

जब कभी तन्हा हुआ ये दिल ज़माने से खफा 
बन के झोका याद का वो गुदगुदाती है मुझे

जब कभी घायल हुआ और दर्द से चीखा हूँ मै
चूम कर माथे को मरहम वो लगाती है मुझे

जब कभी मायूस करती हैं मुझे नाक़ामियाँ 
ख्वाब में आकर वही धाडस बंधाती है मुझे 

जब कभी आतें हैं तूफान घेरने दिल को मेरे 
लड़ती तूफानों से आँचल में छुपाती है मुझे 

बन के परछाई वो हर पल साथ चलती है मेरे 
अब जुदा कर के दिखा किस्मत मेरी माँ से मुझे 

                           - नीतू ठाकुर 


शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

फर्क नहीं पड़ता है कोई करते रहो बवाल ...नीतू ठाकुर

त्राहि त्राहि करती है जनता देश  का बुरा हाल,
फिर भी देश के सारे नेता लगते हैं खुशहाल,
पूँजीपती  के हाथों में है देश का सारा माल,
फिर भी गूँगी बहरी जनता करती नहीं सवाल,
फर्क नहीं पड़ता है कोई करते रहो बवाल,

झूठे सपने सपने बेच रहीं हैं सरकारें बाजारों में,
आस लगाये बैठी जनता नेता घूमें कारों में,
अच्छे दिन की आस में सूखी रोटी हुई मुहाल,
डिग्री लेकर घूम रहें हैं देश के नौनिहाल, 
फर्क नहीं पड़ता हैं कोई करते रहो बवाल,

भूख गरीबी नाच रही है गलियों में चौबारों में,
फिर भी हलचल होती नहीं है देश के पालन हारों में,
विश्व के नक़्शे पर सोने की चिड़िया है कंगाल, 
नारी जब महफ़ूज रही हो नहीं है ऐसा साल, 
फर्क नहीं पड़ता है कोई करते रहो बवाल, 

देश के दुश्मन बन बैठें हैं देश की खातिर काल,
वीर जवानों की कुर्बानी से धरती है लाल, 
चाहे मुख पर कालिख मल दो चाहे करो हलाल, 
कैसे पूतों के हाथों में है ये ये देश विशाल, 
फर्क नहीं पड़ता है कोई करते रहो बवाल, 

                  - नीतू ठाकुर 

सोमवार, 15 जनवरी 2018

इजहार....नीतू ठाकुर


हाथ में हथकड़ी पाओं में बेड़ियाँ 
मै मोहब्बत में तेरे गिरफ़्तार हूँ

जिसको बरसों तलाशा है दिल ने तेरे 
सामने तेरे हमदम वही प्यार हूँ 

जीत कर दिल मेरा मुस्कुराये थे तुम 
जो बचा न सकी दिल वही हार हूँ 

जिसकी खातिर यूँ बेचैन अब तक रहे 
पहली चाहत का पहला मै इजहार हूँ

छोड़ कर दो जहाँ तोड़ कर बंदिशे
जो बसाने चले हो वो संसार हूँ

जिसको माँगा था तुमने दुआओं में वो 
मै हकीकत हूँ तेरी तलबगार हूँ 
                 - नीतू ठाकुर 


शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

ज़िंदगी के पास एक उम्मीद होनी चाहिए.....नीतू ठाकुर


गर्म बिस्तर में सुनहरे ख्वाब बुनता है जहाँ 
सरहदों पर जान की बाजी लगाते नौजवान  
जागते है रात भर की जान बचनी चाहिए 
दुश्मनों से धरती माँ की आन बचनी चाहिए 

बेरहम मौसम हुआ तो चल पड़ी कातिल हवाएँ 
बर्फ की चादर लपेटे ज़िंदगी से खेलने 
चुभ रहे थे बर्फ के नश्तर सभी के जिस्म में 
अब तलक बाकी है जाने कितने मौसम झेलने 

एक अलाव रात भर जलता रहा इस आस में 
ज़िंदगी के पास एक उम्मीद होनी चाहिए 
जम रहा था खून का हर एक कतरा जिस्म में  
बेजान होते जिस्म में कुछ साँस होनी चाहिए 

बर्फ के गोलों से मिटती भूख मिटती प्यास को 
जान बाकी है यही एहसास होना चाहिए 
जान दुनिया पर लुटाने की जरूरत तो नहीं 
उनके जैसा एक जज्बा पास होना चाहिए 

                            - नीतू ठाकुर 

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

तेरे जाने के बाद ....नीतू ठाकुर


क्या जी उठूंगी तेरे आँसुओं से 
क्या खेल पाओगे कभी मेरे गेसुओं से

ढूंढ़ने निकले हो हमको दफ़न हो जाने के बाद 
निशान नहीं मिलते है साहब दिल जलाने के बाद

मुद्दतों तेरी याद में तड़पता रहा है दिल 
वक़्त जाया न कर हस्ती मिटाने के बाद

किसी पत्थर से दिल लगा बैठे थे हम 
बहुत मुस्कुराये थे तुम हमको रुलाने के बाद

वक़्त की मार से कोई नहीं बचता 
कीमत समझ आई तुम्हें मोहब्बत खो जाने के बाद

कितने झूठे ख्वाब मेरे आँसुओं में बह गये 
आज भी आँखे है नम तेरे साथ मुस्कुराने के बाद

कितनी शिद्दत से तुम्हें चाहा था मेरे प्यार ने 
कुछ भी नहीं बचा था दिल तुझ पर लुटाने के बाद

इस कदर मुँह मोड़कर गुजरे थे तुम हमदम मेरे 
बहुत तड़पा था मेरा दिल तेरे जाने के बाद 
                - नीतू ठाकुर 

रविवार, 7 जनवरी 2018

किसी ने ज़िंदगी गँवाई थी ...नीतू ठाकुर


खून से लथपथ बेजान जिस्म 
रास्ते के किनारे पड़ा था 
मंजर बता रहा था वो मौत से लड़ा था 
टूटे हुए जिस्म के बिखरे हुए हिस्से 
कांच के टुकड़ों की तरह बेबस पड़े थे 
बहता हुआ लहू चीख चीख  कर दे रहा था गवाही 
हम भी कभी इस जिस्म से जुड़े थे 
दर्द से चीखती आँखे बहुत छटपटाई थी 
कोई तो बात थी जो लबों तक आई थी 
पर कौन सुनता उसकी दर्द भरी पुकार 
हर तरफ सन्नाटा और गहरी तन्हाई थी 
एक मासूम जिंदगी चार चक्कों में समाई थी 
जश्न के नशे में चूर अमीरजादों को 
गरीबी कहाँ नजर आई थी 
उनके लिए एक हादसा था 
किसी ने ज़िंदगी गँवाई थी 
पथराई आँखों से घूरती वो माँ 
पिता ने तो अपनी सुध ही बिसराई थी 
कितना मासूम और होनहार था मेरा लाल 
फिर किसने उसकी ये हालत बनाई थी 
छूता नहीं था शराब को दूर ही रहता था 
उसी शराब ने आज उसकी ज़िंदगी चुराई थी 
किसी का जश्न किसी के लिए 
मौत का पैगाम बन कर आई थी 
किसी ने होश खोया था 
किसी ने ज़िंदगी गँवाई थी 
साल के साथ साथ किसी के 
खुशियों की बिदाई थी 
          - नीतू ठाकुर 

सौगंध पुरानी ...नीतू ठाकुर 'विदुषी'

 नवगीत सौगंध पुरानी मापनी 12/12 इक नौका इतराती झूमी दीवानी सी हर रेत हुई खारी अर्णव के पानी सी तट मौन खड़े दर्शक वृक्षों की संगत में केसरिया ...