बुधवार, 13 दिसंबर 2017

वक़्त की दहलीज़ पर...नीतू ठाकुर


वक़्त की दहलीज़ पर
रोशनी  सी टिमटिमाई 
रात के अंधियारे वन में 
एक खिड़की दी दिखाई 
चल ख्वाबों के पंख लगाकर 
नील गगन में उड़ते जायें 
तारों से रोशन दुनिया में 
सपनों का एक महल बनायें 
जहाँ बहे खुशियों का सागर 
फूलों की खुशबू को समाये 
ठंडी ठंडी पुरवइया में
इंद्रधनुष झूला बन जाये 
चमक चमक के जुगनू देखो 
अंधियारे में राह दिखायें 
कोयलिया की तन पे तितली 
झूम उठी है पर फैलाये 
चमक रहा अंबर में चन्दा 
बुला रहा बाहें फैलाये 
मुक्त करो अब अपने मन को 
थमा वक़्त गुजर न जाये 

        - नीतू ठाकुर   


18 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह अप्रतिम नाजुक सी कोमल भावों से महकती रचना।
    शुभ दिवस ।

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार
      आप तो माहिर है इस फन में आप की तारीफ पाकर रचना पूर्ण हुई।

      हटाएं
  2. नमस्ते, आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में गुरूवार 14-12-2017 को प्रकाशनार्थ 881 वें अंक में सम्मिलित की गयी है। प्रातः 4:00 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक चर्चा हेतु उपलब्ध हो जायेगा।

    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14 - 12 - 2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2817 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  4. बहुत ख़ूब। बहुत प्रेरणादायक।। wahhh

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    1. बहुत बहुत आभार
      आप की प्रतिक्रिया हौसला बढ़ा जाती है

      हटाएं
  5. बहुत ही सुन्दर व कोमल भाव रचना का

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार
      आप की प्रतिक्रिया हौसला बढ़ा जाती है

      हटाएं
  6. बहुत सुंदर रचना नीतू जी,सकारात्मकता प्रवाहित हो रही है।
    आपकी लयात्मक रचना का जवाब नहीं होता।
    अप्रतिम...👌👌

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार
      एक अलग अनुभव,एक नई सोच
      आसान नहीं था अनजाने से रास्तों पर चलना
      पर कोशिश रंग लायी और आप की प्रतिक्रिया ने मोहर लगाई

      हटाएं

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