रविवार, 23 मई 2021

मन की बात / ओछी सरकार


 *मन की बात*


धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार

किसी छिछोरै प्रेमी जैसी

स्वप्न दिखा ठगती हर बार


बुलट ट्रेन की आस दिलाकर

हँसते देखो सायकल छीन

नाचे नग्न नर्तकी जैसे

माइकल खुद को समझे दीन

अपनी बीवी विधवा कर के

बनते दुनिया के भरतार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


बाँट चवन्नी कहते रुपया

हरिश्चंद्र की ये औलाद

टकरा कर हर आँसू रोया

ऐसा है सीना फौलाद

महँगाई का खीँचे फंदा

बोले गाओ राग मल्हार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


अच्छे दिन का शौक मिट गया

दिनभर ढूँढें रोटी नून

पहले तीन बार खाते थे

अब पाते हैं बस दो जून

घूँघट काढ़े मर्द घूमते

बन्द हुए सारे व्यापार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


अंध भक्त को करते वंदन

मुख से झरते जिनके फूल

कैसे पिघला लेते हैं ये

अंतस में चुभता हर शूल

बस जुमले की टॉफी बाँटे

मिथ आश्वासन की भरमार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


भय लगता है कुछ कहने से

कुत्तों की सुनकर हुंकार

बिना सत्य जाने करते हैं

इनके चेले नरसंहार

देवों ने नत मस्तक होकर

बंद किये अपने दरबार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


कितना नेह लगाया तुमसे

पूज रहा था ये संसार

गिरगिट जैसे रंग बदलते

दैत्य बना है तारणहार

भूल हुई विश्वास किया जो

अब गर्दन पर है तलवार

धोती खोल बाँधती पगड़ी 

ऐसी है ओछी सरकार


नीतू ठाकुर 'विदुषी'

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर व्यंग्य पूर्ण रचना
    अनंत बधाइयां आदरणीया 🙏

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  2. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (24-05-2021 ) को 'दिया है दुःख का बादल, तो उसने ही दवा दी है' (चर्चा अंक 4075) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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  3. सामायिक करारी फटकार।
    आक्रोश से भरी सुघड़ रचना।

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  4. सपने देखना और उसमें खोये रहना आम आदमी को शायद अच्छा लगता है.
    न सपने बेचने वाले कम हैं न कम है इनके खरीददार
    व्यवस्था पर करारा है प्रहार
    देखते हैं कब जागेगी सरकार

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  5. जनता के हाथ में है अगली बार बदल सकती है सरकार

    जवाब देंहटाएं
  6. सरकार का बहुत ही बेहतरीन शब्दों के साथ उनके कार्यकाल का अवलोकन किया है। विश्वास करना गलत बात नहीं है पर अंधा नहीं होना चाहिए। यह बखूबी बताया आपने। कृप्या इस रचना को जरूर आवाज़ दें और हमारे साथ भी जरूर साझा करें। शुभकामना।

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