
मंगलवार, 28 सितंबर 2021
कह मुकरी छंद शतक - नीतू ठाकुर 'विदुषी'

शनिवार, 18 सितंबर 2021
सौगंध पुरानी ...नीतू ठाकुर 'विदुषी'
सौगंध पुरानी
मापनी 12/12
इक नौका इतराती
झूमी दीवानी सी
हर रेत हुई खारी
अर्णव के पानी सी
तट मौन खड़े दर्शक
वृक्षों की संगत में
केसरिया वर्ण सजे
उजली सी रंगत में
तोड़ी चट्टानों ने
सौगंध पुरानी सी
कुछ बूँदों को थामे
दुर्बल आँचल धानी
पाटल मुरझाया सा
करता है मनमानी
वर्णों की माल सजे
लिख प्रेम कहानी सी
चंदा की परछाई
नदिया के मनभायी
छूकर मुस्काती सी
बदरी नभ पर छाई
यादें भरती झोली
इक रात सुहानी सी
नीतू ठाकुर 'विदुषी'
रविवार, 12 सितंबर 2021
हिंदी है निर्धन की भाषा : नीतू ठाकुर 'विदुषी'
गीत
हिंदी है निर्धन की भाषा
मापनी ~ 16/16
भूल गया मनु निज वाणी को
ऐसे जकड़ी धन की माया
हिंदी निर्धन की भाषा है
धनिकों ने कब है अपनाया
बिलख रही है निज आँगन में
बिन अधिकार अभागन बनके
इतराती है सौतन इंग्लिश
रूप सजा कर चलती तन के
अगणित पुत्रों की है माता
जिसका है उपहास उड़ाया
परित्यक्ता बन भटक रही है
न्यायालय के द्वारों पर जो
लज्जित सी अपने होने पर
पाषाणी व्यवहारों पर जो
संस्कृत ने जो पौधा सींचा
उस हिन्दी की शीतल छाया।।
सीखो प्राण गुलामी करना
किस संस्कृति ने सिखलाई है
स्वाभिमान का तर्पण कर के
उन्नति कब किसने पाई है
पीछे कुआं सामने खाई
हर बालक अंधा है पाया
नीतू ठाकुर 'विदुषी'
शुक्रवार, 27 अगस्त 2021
विदुषी व्यंजना गीत नवगीत संग्रह
सादर नमन 🙏
आज मुझे मेरा प्रथम एकल संग्रह "विदुषी व्यंजना" प्राप्त हुआ, जिसे देख कर अपार हर्ष की अनुभूति हुई। इस खुशी की तुलना करना चाहूँ तो यह अनुभव बिल्कुल वैसा ही है जैसा अपने नवजात शिशु को पहली बार देखने पर हुआ था। शिशु के प्रथम स्पर्श ने जिस पूर्णता का आभास कराया था वही आभास आज इस संग्रह ने मेरे कवि मन को कराया है। पन्नों में बिखरे हुए मेरे गीत और नवगीत जब सज-संवरकर एक संग्रह के रूप में मेरे सामने आए तो ऐसा लगा जैसे हर पंक्ति मेरी खुशी में शामिल होकर आभार व्यक्त कर रही है उन्हें एक स्थान और पहचान देने के लिए। अपनी ही रचनाओं को बार-बार पढ़ने का मन होने लगा।
मैं गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ जिनकी प्रेरणा और प्रयास के बिना मैं इस संग्रह की कल्पना भी नही कर सकती थी। गीत नवगीत क्या है यह गुरुदेव से ही जाना और इस संग्रह की प्रथम रचना से लेकर अंतिम रचना तक गुरुदेव का स्नेहाशीष समाया हुआ है। यह संग्रह मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नही है जिसे मैंने गुरुदेव और अपने माता पिता को समर्पित किया है। मेरे पूरे परिवार के लिए यह खुशी का मौका है। मेरी माँ, मेरा भाई, बच्चे और पतिदेव सभी को गर्व की अनुभूति हुई। इस संग्रह में अविस्मरणीय योगदान विज्ञात नवगीत माला मंच का भी रहा है जहाँ सभी साथियों के साथ लिखते-लिखते मैं इतनी रचनाएँ लिख पाई की उसका संग्रह बन सके ....सभी का लेखन इतना आकर्षक है कि लिखने की प्रेरणा तो देता ही है साथ ही नए बिम्बों को कैसे खोजा जाए यह भी सिखाता है।
गुरुदेव के अलावा परम आदरणीय रमेशचन्द्र कौशिक 'गुरुजी', बाबूलाल शर्मा बौहरा 'विज्ञ' जी , अचला शर्मा जी, मेरी माँ सचिता सिंह जी का विशेष आभार मेरे संग्रह का अभिन्न हिस्सा बनने के लिए। मैं विज्ञात प्रकाशन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ कि उन्होंने मेरे संग्रह को इतना सुंदर रूप दिया। लिखने को बहुत कुछ है पर फिलहाल इतना ही ....
आप सभी का स्नेहाशीष यूँ ही मिलता रहे यही ईश्वर से प्रार्थना। इस संग्रह को पढियेगा जरूर 🙏
नीतू ठाकुर 'विदुषी'
मंगलवार, 13 जुलाई 2021
आँखे भर-भर आती है....नीतू ठाकुर 'विदुषी'
गीत
आँखे भर-भर आती है
नीतू ठाकुर 'विदुषी'
कितने किस्से रक्त सने से, आँखे भर-भर आती है।
अश्रु धार फिर कण्टक पथ का, जल अभिषेक कराती है।।
व्यंग्य कसावट लेकर निकले, माता सी धुकती दिखती।
भोर काल में पूर्व दिशा से, रात सदा छिपती दिखती।
और हरण कर बल तारों को, अहम दिखे शशि का लज्जित।
चिड़ियों की चहकों पर आते, होते जब सूर्य सुसज्जित।
दिवस मिले इस दिनकर से जब, खुशियां गीत सुनाती है।
अश्रु धार फिर कण्टक पथ का, जल अभिषेक कराती है।।
तिमिर संकुचित ज्यूँ दिनकर से, हर्ष कष्ट को खो देता।
मत गिनना पुरुषार्थ यही है, मानव के दुख हर लेता।।
कृष्ण पार्थ की उस जोड़ी ने, इतना ज्ञान दिया सबको।
कर्म मार्ग पर बढ़ते जाओ, पय का दान दिया सबको।।
शिथिल इंद्रियाँ बोध दिलाकर, अपना कार्य बनाती है।
अश्रु धार फिर कण्टक पथ का, जल अभिषेक कराती है।।
चाक चले निर्मित घट होता, काल चलाये जन निर्मित।
गीले तन पर लगें थपेड़े, आकृति सुंदर हो चर्चित।।
और बने जन गुल्लक जैसे, जो जीवन भर लेते हैं।
कुछ लटकें पीपल घट जैसे, बनकर भूत चहेते हैं।।
स्वर्णिम युग निर्माण करे नित, ये मानव की थाती है।
अश्रु धार फिर कण्टक पथ का, जल अभिषेक कराती है।।
नीतू ठाकुर 'विदुषी'
सोमवार, 7 जून 2021
चित्र बनते काव्य जो...विपदा @ नीतू ठाकुर 'विदुषी'
विपदा
क्षण भर ठहर सके जो विपदा, मैं अंतस की बातें कर लूँ।
पिघला दूँ हर टीस हृदय की, अपनों की हर पीड़ा हर लूँ।
जीवन हवन कुंड सा तपता, राख बनाता जो सपनों को
बरसों बीत गए हैं देखे, अपनी आँखों से अपनों को
कर्म गणित उलझा सा खुद में, जोड़ घटा से कुछ तो माने
पुनः भेंट कब संभव होगी, ये तो बस विधिना ही जाने
झीनी स्मृतियों की झोली में, कुछ खुशियों के पल तो भर लूँ
क्षण भर ठहर सके जो विपदा, मैं अंतस की बातें कर लूँ।
घोर तिमिर में ढूंढ रही है, बूढ़ी माँ की अंधी ममता
उसका भार उठा कब पाई, मेरे तरुणाई की क्षमता
बचपन की गलियाँ हैं भूली, उनका कोई चित्र बनालूँ
कर्तव्यों की बंजर भू पर, बोध भरा एक पुष्प उगा लूँ
क्षमा याचना कर लूँ उनसे, शीश चरण कमलों में धर लूँ
क्षण भर ठहर सके जो विपदा, मैं अंतस की बातें कर लूँ।
क्षुब्ध हृदय की नीरवता में, गीत अधूरे बिलख रहे हैं।
मेरी उम्मीदों के सूरज, आतुरता से निरख रहे हैं
पाषाणों सी मौन प्रीत को, भाव पुष्प से कुछ महका दूँ
रूठी रूठी सी हर पीड़ा, झूठी आस बँधा चहका दूँ
वंशहीन होने से पहले, कुलदेवी से अंतिम वर लूँ
क्षण भर ठहर सके जो विपदा, मैं अंतस की बातें कर लूँ।
©नीतू ठाकुर 'विदुषी'
मंगलवार, 25 मई 2021
वीरता के उपासक श्रीनेत राजपूत
*वीरता के उपासक श्रीनेत राजपूत*
वंश निकुम्भ जहाँ तक देखा,
रघुकुल का है दिव्य प्रकाश।
जिनकी गौरव गाथाओं को,
गाते हैं धरती आकाश।।
भारद्वाज प्रवर उत्तमता,
कहते ये मित्रों के मित्र।
श्री नगर सा धाम बसा कर,
धरणी पर गढ़ते जो चित्र।।
अंगिरसी है श्रेष्ठ प्रवर जो,
उसकी महिमा देख महान।
कहलाये जो वीर उपासक।
रक्तिम रवि जिनकी पहचान।।
वार्हस्पत्य प्रवर दूजा है
करते इसका श्रेष्ठ बखान।
जिनके श्रम से थे लहराए,
पर्वत नदिया वन खलिहान
चण्डी कुल की देवी को मैं
आज झुकाती अपना भाल।
अपने भक्तों की खतिर जो,
प्रतिपल रहती बनके ढाल।।
साम सुना है वेद हमारा
उत्तम वाणी की पहचान।
रघुकुल से उपजी यह शाखा,
उत्तम कुल का है अभिमान।।
सूत्र सुना गोभिल है हमने
जिसको कहते हैं गृहसूत्र।
मुगलों को पावन करते थे,
छिड़क छिड़क के जो गोमूत्र।।
शाक्त सशक्त कहा है वैष्णव
धर्म इसी का गौरव गान।
सत्यपरायण शासक थे जो,
मर्यादा का रखते भान।।
और प्रमुखगद्दी टिहरी में,
कहते हैं जिसको गढ़वाल।
शौर्य समाया था रग रग में,
बनते थे दुर्बल की ढाल।।
राजा नल से धैर्य मिला था,
दमयंती से पाया रूप।
रघुकुल के वंशज कहलाये,
जन्म समय से श्रेष्ठ अनूप।।
कुण्ड हवन में दहके ज्वाला,
क्षत्रिय कुल का यूँ विस्तार।
बर्फीली चट्टानों में अरि
हिमखण्डों सा ले आकर।।
मुगलों का आतंक मचा था,
धर्मों पर थी तेज कटार।
राजपुताना की तलवारें,
कैसे सहती अत्याचार।।
बैरी बनकर नित आ जाता,
राजाओं का अपना स्वार्थ।
रिपु बनकर षड्यंत्र रचाता,
करना चाहे स्वप्न कृतार्थ।।
दृश्य मनोरम उस घाटी के,
बन बैठे जी का जंजाल।
हर कोई हथियाना चाहे,
शीश मुकुट भारत का भाल।।
आँधी जैसे घुसते जाते,
श्री नगरी पर ले हथियार।
फिर भी धीरज थामे देखा
दीपक की लौ को हरबार।।
लाशों के अम्बार लगाते,
दुश्मन गरजा सीना तान।
वीर उपासक कब सह पाते,
अपनी धरणी का अपमान।।
हार विजय की बात नही थी,
बस खटकी थी वो ललकार।
दुश्मन को अब राख बनाने,
राजपुताना थी तैयार।।
तोपों के सन्मुख होकर भी,
कब घबराए योद्धा वीर।
मातृ धरा की रक्षा के हित,
रिपुदल के दें मस्तक चीर।।
शंख बजाकर नाद करें जब,
कम्पित होते थर-थर प्राण।
माता चण्डी प्रकटी दिखती,
करने को पुत्रों का त्राण।।
तलवारों की गर्जन सुनकर,
रिपु दल की रुक जाती श्वास।
राजपुताना रक्त उबलता,
नस नस में बढ़ता विश्वास।।
दानव जैसे हँसते अरि का,
तोड़ा जबड़ा उखड़े दाँत।
हिमशिखरों की शितलता में,
सून उदर से बाहर आँत।।
विपदा का ताण्डव था छाया,
आँख लिलोरे देखे काल।
मृत्यु दिखी जब रिपुदल भागे,
साहस ऐसा था विक्राल।।
भाल अनंत भुजा बिखरी थी,
घाटी ताण्डव का आधार।
रक्त प्रवाहित नदिया बहती,
क्रंदन गूँजे हाहाकार।।
सैनिक दस्ते और मंगाए,
दुगनी गति से करते वार।
भूकंपी सी आहट होती,
भर तलवारें युद्ध हुँकार।।
रिपु कहता शरणागत आओ,
बच जाएंगे सबके प्राण।
वीरों ने हँसकर ललकारा,
कर बैठेगा तू ही द्राण।।
शीश कटाने को आतुर है,
इस धरती का हर सरदार।
किंतु समर्पण कायरता है,
मर जागेंगे या दें मार।।
रक्त नदी बहती है रण में,
हार विजय की बहती नाव।
चीलों से भरता है अम्बर,
शौर्य बढ़ाते ऐसे भाव।।
चीख रही थी घाटी पूरी,
खोकर अपने प्यारे लाल।
विधवा जैसी दिखती नगरी,
रिक्त हुआ था आँचल भाल।।
जीवन को संघर्ष बनाया,
और नहीं मानें जो हार।
तानाशाही अंग्रेजों पर,
राजपुताना तेज प्रहार।।
गोरिल्ला भी अवसरवादी,
करते रहते थे नित घात।
इनको भी तो धूल चटाई,
दिव्य रही कुल की सौगात।।
दुश्मन देखे छाती पीटे,
जैसे आया सन्मुख काल।
अपनी साँस बचाये मूरख,
या थामे फिर अपनी ढाल।।
कालों के ये काल कहाये,
दुश्मन का करके संहार।
अंग्रेजों की नींद उड़ा दी,
ऐसी देते उनको मार।।
अंग्रेजों के शीश चढ़ा कर,
कुलदेवी को देते मान।
धरती माता के चरणों में,
पूजित है ऐसा बलिदान।।
जिनके भय से छुप जाते थे,
दुष्ट कुकर्मी लेकर प्राण।
मुगलों की नव मील सुरंगे,
देती उसका पुष्ट प्रमाण।।
जीवन को संघर्ष बनाया,
और नहीं मानें जो हार।
तानाशाही अंग्रेजों पर,
राजपुताना तेज प्रहार।।
गोरिल्ला भी अवसरवादी,
करते रहते थे नित घात।
इनको भी तो धूल चटाई,
दिव्य रही कुल की सौगात।।
क्षत्रिय कुल का गौरव ऊँचा,
जिनका रहता ऊँचा शीश।
मात पिता गुरु धरणी पूजें,
रक्षक बनते जिनके ईश।।
गोरखपुर की मिट्टी गाती,
इतिहासों का गौरव गान।
श्रीनेतों की कर्म स्थली है,
जिसका उनको है अभिमान।।
घूँघट काढ़ चलें सब दुश्मन,
भूलें पौरुष बनते नार।
ऐसे वीर लड़ाकू योद्धा,
श्रीनेत बने उनके भरतार।।
झुकना जिनका काम नही है,
लिखते हैं वो ही इतिहास।
राजपुताना गौरव चमके,
जैसे करता सूर्य उजास।।
शत शत वंदन करते उनको,
जिनका है पूजित बलिदान।
भारत वासी होना ही था,
जिनके अन्तस् का अभिमान।।
अपना सबकुछ अर्पण करते,
बनते शासक श्रेष्ठ महान।
शीश झुकाया जिसने अरि से,
वो क्या जाने ये बलिदान।।
उच्च महल खो उच्च हवेली,
जीवित है जिनका अभिमान।
क्षत्रिय कुल नत मस्तक होकर,
देता उन वीरों को मान।।
रिपु के पग की रजकण चाटें,
रजवाडें समझें अपमान।
तोड़ घमण्ड वहाँ दें धन का,
लोग करें जब धन सम्मान।।
जब तक धरती अम्बर जीवित,
तब तक गाएंगे यह गान।
क्षत्रिय कुल के बलिदानों पर,
जीवित है भारत की शान।।
नीतू ठाकुर 'विदुषी'
पहलगाम का किस्सा पूछो : नीतू ठाकुर 'विदुषी'
पहलगाम का किस्सा पूछो मेंहदी लगी हथेली से । प्रिय के शव पर अश्रु बहाती नव परिणीता अकेली से ।। धर्म पूँछकर लज्जित करते तन पर निर्मम वार क...
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राजपूतों की वंशावली : “दस रवि से दस चन्द्र से, बारह ऋषिज प्रमाण, चार हुतासन सों भये , कुल छत्तिस वंश प्रमाण भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान ...
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इंतजार, इजहार, गुलाब, ख्वाब, वफ़ा, नशा उसे पाने की कोशिशें तमाम हुई, आजमाइशें सरेआम हुई अदब, कायदा, रस्में, रवायतें, शराफत, नेकी ...
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जुदा है जिंदगी अपनी जुदा अपनी कहानी है भुला देना की दुनिया में तुम्हारी एक दीवानी है ये बिखरे रंग जीवन के समेटे फिर न जायें...





































