शनिवार, 18 अप्रैल 2020

रेल जैसी जिंदगी : नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नवगीत
रेल जैसी जिंदगी
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी 14/14

और अन्तस् मौन चीखे
धड़धड़ाहट शोर आगे
रेल जैसी ज़िंदगी ये
पटरियों के संग भागे

1
कल्पनाओं से भरा है
मिथ्य यह संसार देखा
बंधनों में बांधती है
जीवितों को भाग्य रेखा
व्याधियाँ हँसने लगी हैं
सो रहे दिन रात जागे।

उलझनें सुलझा रहा मन
साँस का है खेल सारा
कर्म की तलवार लेकर
प्रज्ञ बदले काल धारा
मोह में लिपटे हुए है
नेह के नाजुक ये धागे

3
ज़िंदगी के रूप का जब
भाव हैं श्रृंगार करते
सुख दुखों के मोतियों को
एक दोना देख भरते
बोलती सी बाँसुरी से
लेखनी स्वर आज त्यागे

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

श्वासों की वीणा : नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नवगीत
श्वासों की वीणा
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी~ 16/14

टूटी श्वासों की वीणा ने
सरगम को ऐसे गाया।
झंकृत हिय स्पंदन सा करती
हिरदे गहरा तम छाया।।

1
शरद पूर्णिमा जैसी रातें
देखी अमृत बरसाते
अमर हो गया प्रेम पुष्प पर
देखा जीवित हिय खाते
देकर पाषाणों सी ठोकर
प्रेम कहाँ पर ले आया।।

2
मिश्री सी बातें विष बन कर
अंतस में घुलती जाए
मृग तृष्णा से जाल बिछाकर
जीवन को छलती जाए
वही हॄदय को छोल रहा है
कभी जो मेरे मन भाया।।

3
संग रहा परछाई बन जो
आज वही मुख मोड़ रहा
सूख गई सुख की जलधारा
दुख के बादल ओढ़ रहा
प्रीत रीत को बिसरा कर के
स्तूप विचारों का ढाया।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

मधुमास : नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नवगीत
मधुमास
नीतू ठाकुर 'विदुषी' 

मापनी 13/11

विरह अग्नि दहके बदन
भटक रही थी श्वास
आज प्राण अटके हुये 
ढूंढे एक उजास

1
कलियों का गुंजन सुना
भ्रमर महकते खूब 
शुष्क नहीं तृण एक फिर
चमक उठी हर दूब
लदी खड़ी वह मंजरी 
दृश्य मनोरम पास

2
नृत्य मोर का देखता
हरा भरा उद्यान
पैर देख आहत हुए
गूँगा कोकिल गान
तितली पंख पसारती
पाकर प्रिय आभास 

3
पुलकित हर्षित है नलिन
करता कीच विलाप
विरह बाण की चोट से
मन करता संताप
*उमड़ घुमड़ छाता रहा*
*हृदय प्रीत मधुमास*

4
मधुमासी बहती हवा
छेड़ रही है राग
चंदन से लिपटे हुये 
पूछ रहे कुछ नाग
शान्त चित्त होता तभी
मिले अगर विश्वास ।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

सोमवार, 30 मार्च 2020

अप्सरा : नीतू ठाकुर 'विदुषी'


नवगीत
अप्सरा
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी ~~16/16 

श्रृंगार सुस्त उस यौवन का, 
जो कुंदन गल में पड़ा हुआ।
आहट उसकी पाकर व्याकुल,
अवगुंठन में नग जड़ा हुआ।

1
झुकी पलक से टपके आँसू ,
रतनारे अधरों पर चमके।
चंद्रशिखाएं बिखरी बिखरी,
काले बादल बन कर दमके।
सिंदूरी मुख कहाँ छुपाये,
जब व्यथित हॄदय भी कड़ा हुआ।

2
हार शृंगार चूड़ी कंगन,
अंतस में कुछ पीर जगाये।
काल चक्र अजगर बन निगले, 
प्रेम विरह के स्वप्न बुझाये।
पूनम की रातों में तम का, 
देखा जो घेरा बड़ा हुआ

3
जोगन बन कर घूम रही है
आज अप्सरा इन्द्रलोक की
कोई सुने न विरह वेदना
अंत नही जब दिखे शोक की
वैभव त्याग प्रीत की खातिर
तब विरही मन भी अड़ा हुआ

4
नागिन सी लगती है करधन,
चुभता है बालों का गजरा।
आज कपोलों पर पसरा है,
निर्वासित नैनों का कजरा।
पैरों का बिछुआ लगता है,
उस पैंजनिया से लड़ा हुआ।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

एक गुलाब.... नीतू ठाकुर 'विदुषी'

नवगीत
एक गुलाब
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

स्थाई / मुखड़ा ~~ 16/14 
अंतरा ~~16/16

एक गुलाब ढूंढ कर लाया,
कहाँ गई वो नहीं मिली।
तुझ बिन सावन लागे पतझड़,
मन की बगिया नही खिली।

1
स्मृतियां बादल बन कर छाई,
ढूंढ रही तुझको तन्हाई।
गिरती बूंदे पूछ रही हैं,
तेरी प्रिये नहीं क्यों आई।
भोर बनी मावस की रातें,
देह जलाती हवा हिली।

2
चुभते हैं अब पुष्प हॄदय में,
जो डाली पर डोल रहे हैं।
कोयलिया की कूक सुरीली
स्वर कर्णों को छोल रहे है ।
बाँसुरिया निष्प्राण पड़ी है,
आज धरा से नही झिली।

3
बहुत हँसे सब कष्ट हमी पर,
एक पता फिर पूछे उसका।
स्मृति अन्तस् में बना ठिकाना,
पीर नाम है दाबे जिसका।
फटी हुई ये दहकी धड़कन, 
और हृदय में गई सिली ।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

रविवार, 29 मार्च 2020

पीर मौन : नीतू ठाकुर 'विदुषी'


नवगीत
पीर मौन
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी ~ 16/16

दीवारों के आज अश्रु को
शुष्क धरा ने बहते देखा।
चीख दरारों से भी निकली।
पीर मौन की लांघे रेखा।।
1
इंद्रधनुष बेरंग गगन में,
काले बादल नभ में छाए।
बूंद बूंद को तरसे पनघट,
प्राण धरा में कई समाए।
हरसिंगार गिरे डाली से,
 लगे धरा पर धूल सरेखा।।

2
अमलतास गुलमोहर रूठे,
नोंक कंटकों के हैं टूटे।
कंकड़ पत्थर द्रवित हॄदय ले,
रुष्ट तृणों के अश्रु फूटते
आज प्रकृति भी अँखिया मीचे
बाच रही किस्मत का लेखा।

3
पिया बिना हर भेंट अधूरी,
योजन सम पल भर की दूरी।
चातक ढूंढ रहा स्वाती को,
आये तो तृष्णा हो पूरी।
जली विरह की दग्ध अग्नि जब
होता अंतस राख अदेखा।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

बुधवार, 25 मार्च 2020

निर्वासित सिया - नीतू ठाकुर 'विदुषी'


नवगीत
निर्वासित सिया
नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मापनी~ 16/16

सिय निर्वासित पथ निज कानन,
द्वार हॄदय तक खोल रहा था।
पिया नही क्यों व्यथित सिया के
पत्ता पत्ता बोल रहा था।।

1
शंकित शूल दृष्टि जब चुभती,
पग का हर छाला मुस्काया।
त्याग समर्पण के बदले में,
उपहार यहाँ कैसा पाया।
तब देख परित्यक्त सिया को,
कंकड़ खुद से तोल रहा था।
पिया नही क्यों व्यथित सिया के,
पत्ता पत्ता बोल रहा था॥

2
मोह नही जिसको महलों का
परछाई बन सुख दुख बांटा
पुष्प खुशी के अर्पण कर के
खुद की खातिर कंटक छांटा
हुआ भूमिजा आँचल मैला
धूल कणों को घोल रहा था
पिया नही क्यों संग सिया के
पत्ता पत्ता बोल रहा था।।

3
जनक दुलारी जग से हारी
प्रश्न हॄदय को छोल रहा था
शब्दों के ब्रह्मास्त्र चले थे
 काल पृष्ठ को खोल रहा था
नियति के जाले में फंस कर
भाग्य अधर में डोल रहा था
पिया नही क्यों संग सिया के
पत्ता पत्ता बोल रहा था।।

4
राज महल भी रोया होगा, 
और अयोध्या नगरी सारी।
देख सती की हालत पतली, 
रोई जंगल की फुलवारी।
राह पड़े ये कांटे रोये,
अविरल आँसू डोल रहा था।
पिया नही क्यों व्यथित सिया के
पत्ता पत्ता बोल रहा था॥

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

पहलगाम का किस्सा पूछो : नीतू ठाकुर 'विदुषी'

 पहलगाम का किस्सा पूछो  मेंहदी लगी हथेली से । प्रिय के शव पर अश्रु बहाती  नव परिणीता अकेली से ।। धर्म पूँछकर लज्जित करते  तन पर निर्मम वार क...