नवगीत
आपका आभास
नीतू ठाकुर 'विदुषी'
मापनी~~ 14/14
फिर पलक झुक कर निहारे
आपका आभास पाकर
गूँजती है मौन वाणी
फिर अधूरा गीत गाकर
1
अंतरे में तुम समाये
गीत की रसधार फूटी
तन बिना मन के मिलन से
इस जगत की रीत टूटी
मोड़ते हैं मुख जहाँ से
हम दुखों पर मुस्कुराकर
2
फूल से चुभने लगे है
शुष्क से क्यों नेत्र मेरे
तैरते हैं आँसुओं में
जब पिघलते स्वप्न तेरे
पूछ लो कैसे बिताये
बिन तुम्हारे वर्ष आकर
3
जुगनुओं की रौशनी में
चाँद का प्रतिबिंब देखा
तन हॄदय उसने जलाया
शीत पढ़ती भाग्य लेखा
रागिनी फिर से सुनाए
बाँसुरी को गुनगुनाकर
4
कुछ अधर को थामते से
चित्र यादों ने उकेरे
श्वास की गति तीव्र देखी
धड़कनों पर हाथ फेरे
इक लहर फिर दौड़ आती
छोड़ जाती तिलमिलाकर
नीतू ठाकुर 'विदुषी'






