शनिवार, 3 अप्रैल 2021

दुल्हन बनी तितली...नीतू ठाकुर 'विदुषी'

 

मापनी -11/14


आँगन हँसा अपना

सजी दीवार मुस्काई

दुल्हन बनी तितली

नई खुशियाँ कई लाई


हल्दी सजी तन पर

महावर पाँव को चूमे

ढोलक कमर कसती

अटारी द्वार भी झूमे

परदेस की चिट्ठी

हमारे गाँव में आई


चूड़ी खनकती है

इशारों में करे बातें

आँखों सजा कजरा

जगाती संग में रातें

मिश्री घुली बोली

घटा बन प्रीत की छाई


इठला रही बाती

लिपट कर दीप से बोली

ये ज़िन्दगी मेरी

तुम्हारे नाम की हो ली

गाने लगी चौखट

सुहानी भोर हर्षाई


नीतू ठाकुर 'विदुषी'

गुरुवार, 18 मार्च 2021

स्वप्न की पगडंडियों पर...नीतू ठाकुर 'विदुषी'


 शुष्क से कुछ पुष्प व्याकुल

पुस्तिका से झाँक रोये

स्वप्न की पगडंडियों पर

अनकहे हर भाव खोये


बीहड़ों से इस हॄदय में

हर्ष कब करता बसेरा

स्वप्न की नगरी अनोखी

जी रही जो बिन सवेरा

कंटकों के बाग निष्ठुर

नेह के कब बीज बोये


शब्द लिख लिख कर मिटाती

लिख न पाए एक पाती

लेखनी की धार टूटी

व्यंजना के गीत गाती

देहरी करती करती प्रतीक्षा

जीर्ण तन का भार ढोये


मृत्यु सा दुख यूँ मनाती

आँसुओं की शाल झीनी

कष्ट की परछाइयों में

राख की खुशबू है भीनी

शोक की शैया सजाकर

बाँसुरी के राग सोये


@नीतू ठाकुर 'विदुषी'

बुधवार, 17 मार्च 2021

नेह का गणित...नीतू ठाकुर


 नेह का गणित

(मुक्तक)

मिले जो नेह की गिनती, दहाई पर अटक जाए।
जमा करलो घटा बेशक मगर उत्तर खटक जाए।
गणित के जाल में उलझे पहाड़ा प्रेम का झूठा।
चले दिन रात मन सीधा परीक्षा में भटक जाए।

नवगीत

*नेह का गणित*

भाग करता वेदना का
कष्ट फिर हर्षित हुआ है
ये जमा झंझट पटकता
फोड़ सिर चर्चित हुआ है।।

शून्य से करती गुणा है
हर खुशी को भाग्य रेखा
व्याधियों में स्थित दशमलव
हर घड़ी बढ़ते ही देखा
शून्य सा संसार मेरा
मौन पर गर्वित हुआ है

मूलधन पूरा बचा है
ब्याज में साँसे मिटी हैं
जिंदगी के इस गणित में
सिर्फ खुशियाँ ही घटी हैं
प्रश्न अनसुलझे खड़े हैं
सार ये गर्भित हुआ है

भूमिती सिद्धांत पाकर
ये गणित भी नित्य फलता
वर्ग जब देखे त्रिभुज को
वृत्त को ले साथ चलता
दे विफलता सूत्र भूले
नेह आकर्षित हुआ है।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

पातियाँ संदूक से ...नवगीत


 


पातियाँ संदूक से
मापनी ~ 14/12

यूँ विरह का गान करती
पातियाँ संदूक से
तिलमिलाई है घटा भी 
कोकिला की हूक से।।

कंकड़ों के चीखने से
कब हॄदय पथ का जला
लाँघती है पीर सीमा
घाव अंतस में पला
भाग्य पल में है बदलता
कंडियों में चूक से।।

रेत तपती जा रही है
बूँद बिन ज्यों भूख से
माँगते है प्राण आश्रय
सब झुके हैं रूख से
घास के तृण पीर सहते
सुन रहे हैं मूक से।।

रो रही हैं सब शिलाएँ
जो समाधी पर सजी
फूल भी मुरझा गए सब
जब चटक चूड़ी बजी
दे रही उत्तर व्यथा के
आज फिर दो टूक से।।

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

रविवार, 31 जनवरी 2021

स्ट्रोबेरी मन की बात

यह रचना सरकार के विरुद्ध नही है पर अन्नदाता से गद्दारी नही कर सकते....

आज स्ट्रॉबेरी उगाओ
ये नई तकनीक आई
आय दुगनी हो सकेगी
बात सेवक ने बताई

दो गुनी क्या चीज है फिर
दस गुनी का ज्ञान भी है
रोपनी है कृषि अफीमी 
सौ गुनी का ध्यान भी है
जिद्द पर सरकार बैठी
हो सके यूँ सब भलाई

आज की बेरोजगारी
देश में खुशियाँ मनाती
ये चतुर सरकार देखो
एक मुद्दे पर न आती
चूमती नभ दर विकासी
भाषणों में नित बताई

बोलती सरकार है जब
आज अच्छे दिन तुम्हारे
मानते जो हैं नही ये
देशद्रोही वो हमारे
रीत सत्ता जो चलाती
बात उसने ये सिखाई

धान बाली रो रही है
देख कर अपनी गरीबी
व्यर्थ सारे श्रम हुए हैं
स्ट्रॉबेरी लगती करीबी
रोटियां रूठी हुई हैं
खीर सत्ता ने बनाई

स्वप्न सुंदर बेचते हैं
गोलियाँ मीठी खिलाकर
शेखचिल्ली भी लजाता
इक स्वयं का शिष्य पाकर
शर्म से भारत झुका है
किरकिरी देती दिखाई

चाहतें सरकार की हैं
तुगलकी फरमान जैसे
माननी सबको पड़ेंगी
हो सके ये सत्य कैसे
दूत यम के बन खड़े हैं
इक ध्वजा उसको थमाई

आज आंदोलन मिटाना
चाहती सरकार अपनी
एकता को तोड़ कर यूँ
अब दिखाती धार अपनी
बात समझें नाक की क्यों
सच न देता क्यों सुनाई

नीतू ठाकुर 'विदुषी'

शनिवार, 30 जनवरी 2021

श्रेष्ठ ये सरकार...नीतू ठाकुर 'विदुषी'

बन अराजक तत्व घेरे

ये कृषक दिल्ली हमारी

कष्ट उल्का पिंड बरसा

दोष में सरकार सारी


आज आतंकी दिखे क्यों

शांति के जो हैं उपासक

फिर स्वयं झंडा लगाकर

चाहता क्या आज शासक

रात दिन षड्यंत्र रचती

आज की सरकार न्यारी


रोग कोरोना रुलाये

अश्रु से सूखा नही था

तब किसानी धौर्य चमका

देश जो भूखा नही था

आज अपने इस कृषक की

त्रासदी किसने निहारी


ऋण भला क्यों माँगती है

श्रेष्ठ ये सरकार ऐसे

ये कृषक बिन ऋण सबल जब

बेचते क्यों रेल जैसे 

छोड दे लालच अगर ये

ढाल अपनी सोच प्यारी


नीतू ठाकुर 'विदुषी'

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

मनहरण घनाक्षरी (कोरोना)

 


दो ही गज की हो दूरी

रक्षा करनी है पूरी

सावधानी रखनी है 

मास्क भी लगाइये।


कोरोना का रोना भारी

खतरों की है बीमारी

सबको ही बचना है 

रोग से बचाइये।


घर में ही वास करें

इच्छाओं को दास करें

जन जागृति जरूरी

भय को भगाइये


परीक्षा की है ये बेला

चीन ने खेला है खेला

एकता का मंत्र जप

शत्रु को हराइये


नीतू ठाकुर 'विदुषी'

पहलगाम का किस्सा पूछो : नीतू ठाकुर 'विदुषी'

 पहलगाम का किस्सा पूछो  मेंहदी लगी हथेली से । प्रिय के शव पर अश्रु बहाती  नव परिणीता अकेली से ।। धर्म पूँछकर लज्जित करते  तन पर निर्मम वार क...