मापनी -11/14
आँगन हँसा अपना
सजी दीवार मुस्काई
दुल्हन बनी तितली
नई खुशियाँ कई लाई
हल्दी सजी तन पर
महावर पाँव को चूमे
ढोलक कमर कसती
अटारी द्वार भी झूमे
परदेस की चिट्ठी
हमारे गाँव में आई
चूड़ी खनकती है
इशारों में करे बातें
आँखों सजा कजरा
जगाती संग में रातें
मिश्री घुली बोली
घटा बन प्रीत की छाई
इठला रही बाती
लिपट कर दीप से बोली
ये ज़िन्दगी मेरी
तुम्हारे नाम की हो ली
गाने लगी चौखट
सुहानी भोर हर्षाई
नीतू ठाकुर 'विदुषी'






